ग्रामीण शक्ति संरचना से आप क्या समझते हैं ? समकालीन ग्रामीण भारत में इसके उदीयमान प्रतिमानों का वर्णन कीजिए- What do you understand by rural power structure?
भारत में ग्रामीण शक्ति संरचना एवं नेतृत्व के अध्ययन के प्रति समाजशास्त्रियों की रुचि कुछ वर्षों पूर्व उत्पन्न हुई है एवं अनेक भारतीय समाज वैज्ञानिकों ने ग्रामीण राजनीतिक व्यवस्था में ऐसे अनेक अध्ययन किया है। डॉ . योगेन्द्र सिंह ने उत्तर प्रदेश के छः गाँवों में शक्ति संरचना का अध्ययन किया। एम.एन.श्रीनिवास एवं श्याम दूबे ने ग्रामीण नेतृत्व के प्रतिमानों का अध्ययन-पद्धति का उल्लेख किया है ।
श्रीनिवास ने ग्रामीण नेतृत्व में प्रभु जाति की अवधारणा को महत्वपूर्ण स्थान दिया है , जबकि दुबे प्रभू जाति की अपेक्षा कुछ व्यक्तियों तक ही नेतृत्व की अवधारणा को समित मानते हैं। प्रभात चन्द्रा ने अपने लिखे एक लेख में परम्परागत नेतृत्व के पक्ष में ग्रामीण नेतृत्व का अध्ययन किया है। पार्क एवं टिंकर की संकलित कृति 'लीडरशिप एण्ड पोलिटिकल इंस्टिट्यूशन इन इंडिया' में अनेक विद्वानों ने अपने अपने अध्ययन प्रस्तुत किये हैं। इनमे ओपलर, वुड, हिबकाक, आरेनस्टेन, विल्स मैकारमैक, हारपर आदि ने अनेक लेख लिखे हैं।
शक्ति की अवधारणा ( Concept of power )
साधारण अर्थ में शक्ति का तात्पर्य किसी भी व्यक्ति एवं समूह के उस दबाव से समझा जाता है, जो अन्य व्यक्तियों अथवा समूहों पर स्पष्ट होता है । एक अवधारणा के रूप में शक्ति का सम्बन्ध एक विशेष प्रस्थिति तथा उनसे सम्बन्धित भूमिका के निर्वाह से है ।
मैक्स वेबर के अनुसार, " सामान्यतः हम शक्ति को एसक व्यक्ति अथवा अनेक व्यक्तियों द्वारा इच्छा को दूसरे पर क्रियान्वित करने अथवा दूसरे व्यक्ति द्वारा विरोध करने पर भी पूर्ण कर लेने की स्थिति को कहते हैं । "
हार्टन एवं हण्ट के अनुसार, " शक्ति का अर्थ है , दूसरों की क्रियाओं को नियन्त्रित करने की क्षमता । "
उपरोक्त दोनों परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि ' शक्ति किसी व्यक्ति अथवा समूह में निहित एक ऐसी क्षमता है जिसके द्वारा शक्ति को धारण करनेवाला व्यक्ति अथवा समूह दूसरों की इच्छा के न होते हुए भी उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करने को बाध्य करता है और सभी निर्णय अपने ही पक्ष में करा लेने में सफल हो जाता है । '
जातियाँ और वर्ग प्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण शक्ति संरचना को प्रभावित करते थे जबकि आज इनकी भूमिका परोक्ष अथवा प्रच्छत्र रूप से महत्वपूर्ण बनी हुई है । किन्तु गाँवों में निम्न जातियों ने अपनी संख्या - शक्ति के आधार पर गाँव पंचायतों के पदों पर अधिकार कर लिया है, उन्हें भी उच्च जातियों और उच्च वर्गों की शक्ति के कारण गम्भीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ।
ग्रामीण शक्ति के नये प्रतिमान
ग्रामीण शक्ति के नये प्रतिमानों को निम्नलिखित रूप से देखा जा सकता है -
जमींदारी प्रथा-
उन्मूलन के कानून ने ग्रामीण प्रजातन्त्र को तीव्र गति प्रदान की भूमि में मध्यस्थ अधिकारियों की समाप्ति करने से पुराने काश्तकारों के परिवारों की आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्र में जमींदारी के अधिकारों से मुक्ति मिली । नम्बरदार व मुखिया के पदों को समाप्त कर दिया गया । जो बाग - बगीचे , तालाब , चरागाह भूमि जमींदारों के अधिकारों में थे , उन्हें गाँव की सामूहिक सम्पत्ति घोषित कर दी गयी । और उन पर नयी चुनी हुई पंचायत को अधिकार एवं प्रशासन सौंप दिया गया । गाँव का चौकीदार चुनी हुई पंचायत के अधिकारियों के प्रति उत्तरदायी बना दिया गया ।
प्रजातन्त्रीय परिवर्तन-
इस प्रकार समाजशास्त्रीय दृष्टि से ग्रामीण समुदाय की सामाजिक , आर्थिक एवं शक्ति - संरचना में महत्वपूर्ण प्रजातन्त्रीय परिवर्तन कर दिये गये । कानूनों की दृष्टि से गाँव में सामूहिक सम्बन्धों की प्राचीन व्यवस्था पर व्यक्ति को शक्ति - व्यवस्था में सहभागी बनाया । जाति का महत्व भी समाप्त कर दिया गया । इस प्रकार प्रदत्त पदों के स्थान पर अर्जित पदों को महत्व दिया गया जो समाजशास्त्र दृष्टि से परम्परागत ग्रामीण विश्व दृष्टिकोण में परिवर्तन का प्रयास कहा जा सकता है ।
नयी विकास पंचायतों एवं न्याय पंचायतों का उद्देश्य -
ग्रामीण शक्ति के स्त्रोतों को जन सहयोग तथा लोकतन्त्र पर आधारित करना था । ग्रामीण नेताओं का चुनाव वर्ग एवं जाति के स्थान पर उनके अर्जित गुणों के आधार पर होने लगा। यद्यपि पंचायत चुनावों से सम्बन्धित अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि अब भी कई गाँवों में पंच एवं सरपंचों के चयन में जाति एवं वर्ग का महत्व कम नहीं हुआ है ।
आर्थिक विषमता के कारण भू - स्वामियों , बड़े - बड़े किसानों तथा साहूकारों का अब भी ग्रामीण शक्ति - संरचना अब भी बनी हुई है । इसके लिए उनकी निम्न एवं दयनीय आर्थिक स्थिति उत्तरदायी है । गाँव की उच्च जाति एवं वर्ग के साथ मध्यम एवं निम्न जातियों तथा वर्गों का असन्तोष एवं संघर्ष धीरे - धीरे बढ़ रहा है ।
( 1 ) व्यक्ति से व्यक्ति की ओर सहचरण -
परम्परात्मक ग्रामीण समाज - व्यवस्था में परिवार में पत्नी एवं पति को , वयोवृद्ध लोगों को युवा लोगों पर , बड़े भाई - बहिनों को छोटे भाई बहिनों पर , शक्ति प्राप्त थी । परम्परागत व्यवस्था में भूमिकाओं व पदों के निर्धारण में समानता के सिद्धान्त का पालन नहीं किया गया थीं । उत्तराधिकार में बड़े भाई का हिस्सा अन्य भाईयों की तुलना में अधिक था । वर्तमान में पति - पत्नी , पिता - पुत्र और भाई - भाई के सम्बन्धों में समानता की भावना का प्रवेश हुआ है तथा शक्ति के स्वरूप में परिवर्तन हुआ है ।
( 2 ) व्यक्ति के समूह की ओर -
परम्परागत संयुक्त परिवार में परिवार का मुखिया अथवा कर्ता का ही सारे परिवार पर प्रभुत्व था । इसी तरह गुरु और पुजारों का अपने जजमानों पर साहूकार का पूरे गाँव पर , गाँव पंच का झगड़ा करने वाले दलों पर प्रभुत्व था । गाँव के नेता व नेताओं का गुटों पर , भातृदलों , जातियों और अन्य संगठनों का उन समूहों पर प्रभुत्व था जिनका वे प्रतिनिधित्व करते थे । यदि कोई नया समूह बनता तो उसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त करनी होती थी । किन्तु वर्तमान समय में भारतीय गाँवों में शक्ति का केन्द्रीकरण उन लोगों के हाथ में है जो लोग गाँववालों को आर्थिक सुविधाएँ दिलाने , उनकी कठिनाइयों को दूर करने और विकास कार्यों को सम्पन्न करने में सहयोग प्रदान कर सकते हैं ।
( 3 ) समूह से व्यक्ति की ओर -
ग्रामीण क्षेत्रों में समूह का व्यक्ति पर प्रभुत्व पाया जाता रहा है । गाँववालों को राजनीतिक दलों एवं समाज - सुधार आन्दोलनों ने जाति - पंचायतों व ग्राम पंचायत के विरुद्ध तैयार किया । एक व्यक्ति राजनीतिक दल अथवा सुधार आन्दोलन की सदस्यता ग्रहण की करके शक्ति प्राप्त कर सकता था । इस प्रकार गाँव में शक्ति का सहचरण समूह से व्यक्ति की ओर भी रहा है ।
( 4 ) समूह से समूह की ओर -
शक्ति के सहचरण से शक्ति सम्बन्ध सत्ता के साथ - साथ व्यवस्थित होते हैं । उदाहरण के लिए , सर्वोच्च न्यायालय व अधीनस्थ न्यायालय का सम्बन्ध और केन्द्र व राज्यों का सम्बन्ध समूह से समूह की ओर शक्ति सहचरण को प्रकट करता है ।
( 5 ) समुदाय से समुदाय, समूह तथा व्यक्ति की ओर शक्ति का सहचारण -
एक परगना, मोहल्ला, भाषाओं क्षेत्र और राज्य - शक्ति के लिए अपने ही समान इकाईयों , समूहों व व्यक्तियों से प्रतिस्पर्द्धा करते हैं । सामुदायिक विकास योजना खण्ड भी इस प्रतिस्पर्द्धा में सम्मिलित हो गये हैं ।
निष्कर्ष
उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि गाँवों में आज भी शक्ति संरचना में परम्परात्मक शक्ति व्यवस्था का महत्व है । परिवार में आयु के आधार पर टिकी हुई है । गाँव में अब भी उच्च जातियों अपने प्रभुत्व का प्रयोग निम्न जातियों पर करती हैं । गाँव में अब भी पंचायतों ग्रामीण क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है । यद्यपि वर्तमान में इन सभी क्षेत्रों में परिवर्तन की लहर दिखायी देती है ।
परिवार में यदि कोई सदस्य कर्ता से अधिक शिक्षित, बुद्धिमान और आर्थिक क्षमता रखता है तो वह कर्ता की शक्ति छीन लेता है । उधर निम्न जातियों में शिक्षित , समृद्ध, भू - स्वामी व्यक्ति नयी पंचायत व्यवस्था में मतदान के आधार पर उच्च जाति के लोगों की शक्ति को चुनौती दे रहे हैं, गाँवों पंचायत में शक्ति-व्यवस्था का मिश्रित रूप देखा जा सकता है ।
निम्न जातियों के लोग संख्या और सुरक्षित स्थानों के कारण पंचायतों में स्थान ग्रहण कर शक्ति व्यवस्था अपने हाथ में लेने के लिए प्रयत्नशील हैं तो दूसरी ओर भू - स्वामित्व एवं आर्थिक समृद्धि के कारण जमींदार , साहूकार एवं उाच्च जातियों के व्यक्ति गाँवों में व अनौपचारिक रूप से शक्ति - संचालन में अब भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते रहे हैं
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