भोजन के कार्य Work of Food
मनुष्य ही क्या, प्राणिमात्र के जीवन एवं अस्तित्व के साथ भोजन का घनिष्ठ सम्बन्ध है। भोजन के बिना व्यक्ति का जीवन ही असंभव है। अतः निरन्तर रूप से जीवन भर भोजन ग्रहण करना अनिवार्य है। सभ्य समाजों में भोजन अर्जित करना पड़ता है तथा उसके लिए व्यवस्थित ढंग से प्रयास करने पड़ते हैं। इस प्रयास के अन्तर्गत व्यक्ति भिन्न व्यवसायों में से किसी एक को अपनाता है। इस प्रकार भोजन अर्जित करने के ढंग का सम्बन्ध समाज से भी स्थापित हो जाता है।
समाज में रहकर अच्छे एवं मान्यता प्राप्त ढंग से उत्तम भोजन अर्जित कर लेने पर व्यक्ति को एक विशेष प्रकार का सन्तोष एवं सम्मान का अनुभव होता है। इसके विपरीत, असम्मानजनक ढंग से भोजन अर्जित करने पर एक प्रकार की हीन-भावना का अनुभव करना पड़ता है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि भोजन का सम्बन्ध जीवन के विभिन्न पक्षों से है तथा जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में भोजन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भोजन के इस बहुपक्षीय महत्व को ध्यान में रखते हुए भोजन के कार्यों को अध्ययन की सुविधा अनुसार तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है।
ये वर्ग हैं क्रमशः-
(क) भोजन के शारीरिक कार्य,
(ख) मनोवैज्ञानिक कार्य तथा
(ग) सामाजिक कार्य ।
भोजन के तीनों प्रकार के कार्यों का सामान्य परिचय निम्नलिखित वर्णित है
(क) भोजन के शारीरिक कार्य
भोजन के शारीरिक कार्यों को तीन भागों में विभक्त करके निम्नलिखित रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है-
1. ऊर्जा प्रदान करना
प्रत्येक जीवित शरीर निरन्तर रूप से विभिन्न क्रियायें करता रहता है। शरीर की प्रत्येक क्रिया द्वारा कुछ-न-कुछ ऊर्जा व्यय होती रहती है। ऊर्जा के इस प्रकार निरन्तर खर्च होने के कारण शरीर को हर समय अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। शरीर की ऊर्जा आवश्यकता की यह पूर्ति भोजन ग्रहण करने से ही होती है।
भोजन ग्रहण करने से हमारे शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है तथा शरीर की विभिन्न क्रियायें सुचारु रूप से चलती रहती हैं। हमारे भोजन के अनिवार्य तत्त्वों में कार्बोहाइड्रेट, वसा तथा प्रोटीन ही ऐसे तत्त्व हैं जो शरीर को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करते हैं। शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले मुख्य भोज्य पदार्थ हैं- अनाज, दालें, चीनी, गुड, सूखे मेवे, खजूर, घी, तेल तथा जड़दार सब्जियाँ आदि। अधिक शारीरिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियों को इस प्रकार के ऊर्जादायक भोज्य पदार्थ अधिक मात्रा में ग्रहण करने चाहिए।
2. शरीर के तन्तुओं का निर्माण एवं क्षति में पूर्ति
प्रारंम्भ अथवा भ्रूणावस्था से ही शरीर का निर्माण प्रारम्भ होता है तथा निरन्तर उसका विकास एवं वृद्धि होती रहती है। इसके लिये शरीर में असंख्य ऊतकों का निर्माण होता है। शरीर के इन कतकों के निर्माण के लिये विशिष्ट प्रकार के भोजन की आवश्यकता होती है अर्थात् भोजन का एक कार्य शारीरिक तन्तुओं एवं ऊतकों का निर्माण भी है। शरीर के ऊतकों के निर्माण के लिये मुख्य रूप से प्रोटोन, खनिज लवण तथा जल का योगदान होता है।
प्रोटीन प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं-
दूध तथा दूध से बने भोज्य-पदार्थ, मांस, मछली, अण्डा, सोयाबीन, दालें, हरी सब्जियाँ तथा सूखे मेवे आदि। इसी प्रकार खनिज लवण भी विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किये जाते हैं।
शरीर के तन्तुओं के निर्माण के अतिरिक्त शरीर के तन्तुओं के रख-रखाव एवं मरम्मत आदि के लिये भी भोजन की आवश्यकता होती है। हमारे शरीर के विभिन्न तन्तु निरन्तर टूटते-फूटते तथा घिसते रहते हैं। इन तन्तुओं की मरम्मत एवं क्षतिपूर्ति का कार्य भी भोजन ही करता है।
3. रोगों से बचाव तथा शरीर के नियमन में सहायक
शरीर का निर्माण एवं विकास ही काफी नहीं, बल्कि उसे रोगों से मुक्त रखना तथा समस्त शारीरिक क्रियाओं का उचित नियमन भी जरूरी है। भोजन का एक मुख्य कार्य शरीर में रोगों से बचने के लिये प्रतिरोधात्मक शक्ति पैदा करना भी है। पौष्टिक एवं सन्तुलित भोजन ग्रहण करने से हमारे शरीर में ऐसी क्षमता बनी रहती है जिससे आसानी से रोगों का आक्रमण हमारे शरीर पर नहीं हो पाता।
इसके अतिरिक्त शरीर को विभिन्न क्रियाओं के नियमन के लिये भी भोजन की आवश्यकता होती है। हमारे शरीर में विभिन्न हार्मोन्स, एंजाइम तथा रसों का निर्माण होता है। जिनसे शरीर की क्रियाओं का नियमन होता रहता है। इन नियामक तत्त्वों के निर्माण का कार्य भी भोजन ही करता है। हमारे भोजन में विद्यमान तत्त्व प्रोटीन, वसा, खनिज, लवण, विटामिन तथा जल से इस उद्देश्य की पूर्ति होती है अर्थात् इन भोज्य-तत्त्वों से शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति पैदा होती है तथा शरीर की क्रियाओं का नियमन होता है।
(ख) भोजन के मनोवैज्ञानिक कार्य
मनुष्य केवल एक प्राणिमात्र ही नहीं है बल्कि उसमें पर्याप्त विकसित मनोवैज्ञानिक चेतना भी है। मनुष्य शारीरिक भूख एवं आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त मानसिक सन्तोष एवं तृप्ति भी चाहता है। मनुष्य में अनेक मेनोवृत्तियाँ एवं अनुभूतियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। मनुष्य के मानसिक सन्तोष के लिये भी भोजन का पर्याप्त महत्त्व है। मनुष्य उत्तम भोजन ग्रहण करके मानसिक रूप से सन्तुष्ट होता है। उसकी कुछ हद तक आत्म-प्रदर्शन की वृत्ति भी तृप्त होती है।
एक कुशल गृहिणी अच्छा भोजन तैयार करके तथा अपने परिवार के सदरयों को खिलाकर अपने आपको धन्य मानती है। इसके अतिरिक्त समाज द्वारा मान्यता प्राप्त ढंग से अच्छा भोजन अर्जित कर लेने से व्यक्ति को गौरव का अनुभव होता है। सामान्य रूप से परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं। इससे सभी सदस्यों में पारस्परिक प्रेम की वृद्धि होती है तथा प्रसन्नता होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भोजन का एक कार्य व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को पूरा करना भी है।
(ग) भोजन के सामाजिक कार्य
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। व्यक्तिगत पक्ष के अतिरिक्त, उसका एक सामाजिक पक्ष भी है। वह समाज का एक सदस्य बनकर ही जीवन व्यतीत करता है अतः उसे विभिन्न सामाजिक अन्तःक्रियाओं में भी भाग लेना होता है। उसकी बहुत-सी आवश्यकताएँ समाज में रहकर ही पूरी होती हैं। व्यक्ति की सामाजिकता की वृत्ति के विकास में भोजन से उल्लेखनीय योगदान मिलता है।
प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसके कुछ मित्र हों तथा वह कुछ लोगों का मित्र हो। समाज में मित्रता के विकास के लिये प्रीतिभोजों का आयोजन विशेष रूप से सहायक होता है। जब हम किसी के घर प्रीतिभोज में सम्मिलित होने जाते हैं अथवा हमारे घर कोई आता है तो मित्रता में वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त, भोजन के माध्यम से ही समाज में सहयोग की भावना का विकास होता है।
मुद्रा के प्रचलन से पूर्व तो मानव-समाज के खाद्य-सामग्री का आदान-प्रदान ही हुआ करता था। आज भी सर्वाधिक क्रय-विक्रय खाद्य-पदार्थों का ही होता है। समाज में सहानुभूति नामक सदगुण के विकास में भी भोजन सहायक होता है। समाज में कुछ व्यक्ति दुर्भाग्यवश अभावग्रस्त है, उनके पास भोजन का अभाव है। ऐसे व्यक्तियों को भोजन देना सच्ची सहानुभूति है। इसलिये भूखे को भोजन कराना सबसे बड़ा धर्म माना जाता है।
कुछ धर्मों में लंगर (सामूहिक भोजन) का प्रचलन है। सिक्ख धर्म में जात-पात, ऊँच-नीच या धर्म के भेदभाव को भुलाकर एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन-ग्रहण करने की व्यवस्था है। हमारे बहुत से सामाजिक पर्व, त्योहार आदि में भी भोजन का महत्व है। दीपावली, होली तथा ईद के अवसर पर आपस में मिठाइयों का आदान-प्रदान प्रायः सभी समुदायों में होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सामाजिक क्षेत्र में भी भोजन का विशेष महत्त्व है।

