वसा
शरीर के लिये अति आवश्यक तत्त्वों में वसा (Fats) का विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान है। वसा शरीर के लिये विभिन्न प्रकार से उपयोगी होती है। वसा न केवल शरीर की विभिन्न क्रियाओं के सुचारु परिचालन के लिये ही उपयोगी है, बल्कि शरीर की सुरक्षा के लिये भी यह विशेष भूमिका निभाती है।
शरीर के लिए वसा की उपयोगिता ( The Utility of Fat for the Body )
(1) शरीर में भोज्य पदार्थ के रूप में संचित रहती है
भोजन में महण की गयी वसा शरीर में वसा ऊतकों के रूप में एकत्र हो जाती है। यह एकत्रित वसा शरीर के लिये विशेष उपयोगी होती है। जिस समय शरीर में अन्य ऊर्जा उत्पादक भोज्य पदार्थ विद्यमान नहीं होते उस समय यह संचित वसा शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है। इस संचित वसा का ऑक्सीकरण होता है तथा शरीर को आवश्यक शक्ति प्राप्त हो जाती है।
(2) अधिक समय तक ऊर्जा उत्पन्न करने में उपयोगी
वसा के अतिरिक्त अन्य ऊर्जा दायक भोज्य पदार्थ केवल उसी समय ऊर्जा प्रदान करते हैं, जब उन्हें भोजन में ग्रहण किया जाता है। अन्य ऊर्जा दायक पदार्थ केवल सीमित मात्रा में ही शरीर में संचित रह पाते हैं, परन्तु वसा या लाइपिड्स पर्याप्त मात्रा में चर्बी के रूप में ही शरीर में संचित रहते हैं अतः ये शरीर में ऊर्जा उत्पन्न करने वाले स्थायी स्रोत हैं। हृदय की माँसपेशियों को वसा से ही आवश्यक ऊर्जा प्राप्त होती है।
(3) वसा से ग्रहण किये गये भोजन का मूल्य बढ़ता है
कुछ विटामिन जैसे कि 'ए', 'डी', 'ई', तथा 'के' आदि विटामिन केवल वसा में ही घुलनशील होते हैं। अतः वे विटामिन वसा में घुलकर शरीर के सभी भागों में तम्तुओं तक पहुँचते हैं तथा शरीर को लाभ पहुँचाते हैं। यदि शरीर में वसा की समुचित मात्रा न हो तो शरीर सम्बन्धित वसा घुलित विटामिन का शोषण नहीं कर सकता ।
(4) वसा से आवश्यक वसीय अम्ल प्राप्त होते हैं
वसा को ग्रहण करने से शरीर को आवश्यक वसीय अम्ल (Essential-Fatty Acids) प्राप्त हो जाते हैं। ये वसा-अम्ल स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक आवश्यक एवं उपयोगी होते हैं। ये वसा-अम्ल शरीर की उचित वृद्धि के लिये जरूरी होते हैं तथा त्वचा को निरोग रखने में सहायक होते हैं। आवश्यक वसा अम्लों से व्यक्ति के हृदय तथा गुर्दों को भी बल मिलता है।
(5) शरीर को सुरक्षा प्रदान करना
वसा शरीर को विभिन्न प्रकार से सुरक्षा प्रदान करती है। शरीर के कुछ कोमल अंगों जैसे कि हृदय एवं गुर्दों के चारों ओर वसा एकत्र हो जाती है तथा इन अंगों की आघातों आदि से सुरक्षा होती है। अंग वसा के कारण स्थिरता भी प्राप्त करते हैं।
(6) शरीर के ताप के नियमन में सहायक
हमारे शरीर के तापक्रम को नियमित बनाये रखने में वसा का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। हमारे शरीर में त्वचा. के नीचे वसा की एक तह बनी रहती है। वसा की यह तह ताप की कुचालक होने के कारण बाहरी पर्यावरण का तापक्रम बढ़ जाने पर भी शरीर के तापक्रम को सामान्य बनाये रखती है।
(7) प्रोटीन की बचत में सहायक
यदि हमारे भोजन में वसा की पर्याप्त मात्रा होती है तो कार्बोज के साथ-साथ यह भी शरीर को उचित मात्रा में ऊष्मा प्रदान करती है। इस स्थिति में शरीर में विद्यमान प्रोटीन को ऊष्मा प्रदान करने के लिये इस्तेमाल नहीं करना पड़ता। अतः प्रोटीन की अन्य उपयोगी कार्यों के लिये बचत हो जाती है। प्रोटीन का मुख्य कार्य शरीर का निर्माण एवं वृद्धि करना है।
(8) पाचन-संस्थान की क्रियाशीलता में सहायक
वसा शरीर के पाचन संस्थान की क्रियाशीलता को सुचारु बनाने में भी सहायक होती है। वसा से हमारे शरीर की आँतें तथा आमाशय चिकने बने रहते हैं। वसा आँतों की त्वरित गति को सुचारु बनाये रखने में भी सहायक होती है।
(9) स्वाद प्रदान करना
वसा की एक उपयोगिता भोजन को स्वाद प्रदान करना भी है। इससे भोजन स्वादिष्ट बन जाते हैं।
शरीर में वसा की कमी ( Lack of body fat )
वसा शरीर के लिये विशेष रूप से उपयोगी एवं आवश्यक है। अतः हमारे भोजन में वसा की समुचित मात्रा का होना आवश्यक है। यदि हमारे भोजन में वसा की पर्याप्त मात्रा नहीं होती तो अनेक प्रकार की हानियाँ होने की सम्भावना रहती है। सर्वप्रथम कहा जा सकता है कि वसा की कमी के परिणामस्वरूप बच्चों एवं किशोरों की शारीरिक वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है।
इसकी कमी से त्वचा में विकार आ जाते हैं, त्वचा प्रायः खुरदरी हो जाती है तथा कहीं-कहीं उसमें दरारें सी भी पड़ने लगती हैं। वसा या लाइपिड्स की न्यूनता से पैरों में सूजन भी आ जाती है। यदि शरीर में वसा की समुचित मात्रा नहीं होती तो परिणामस्वरूप शरीर में उन विटामिनों की कमी हो जाती है जो वसा में घुलित होते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति विटामिन की कमी से होने वाले रोगों का भी शिकार हो जाता है। शरीर में वसा की कमी के परिणामस्वरूप शरीर की ऊर्जा घट जाती है तथा व्यक्ति सुस्त रहो लगता है। थोड़ा सा परिश्रम करने से ही व्यक्ति थक जाता है।
शरीर में वसा की अधिकता (Excess body fat)
यह सत्य है कि शरीर में वसा की कमी के विभिन्न प्रतिकूल परिणाम होते हैं परन्तु शरीर में वसा की अधिकता के भी भयंकर परिणाम देखे जा सकते हैं। अधिक मात्रा में संतृप्त वसा ग्रहण करने से वसा की एक परत रक्त की धमनियों में जमने लगती है। इस पर्त के जमने से रक्त धमनियाँ संकरी होने लगती हैं तथा परिणामस्वरूप रक्त का संचालन सुचारु रूप से नहीं हो पाता। इस स्थिति को एथीरोसक्लोरोसिस (Atherosclorosis) कहते हैं।
वसा की अधिकता से रक्त में कोलेस्टेरॉल की अधिकता हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप कारोनरी हृदय आक्रमण तथा पक्षाघात जैसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका हो जाती है। इससे मृत्यु तक हो सकती है। अधिक वसा ग्रहण करने के परिणामस्वरूप यह वसा चर्बी के रूप में हृदय के चारों ओर एकत्र होने लगती है। इससे हृदय की गति में बाधा होने लगती है। इसके अतिरिक्त यह तो स्पष्ट है ही कि वसा की अधिकता से शरीर का मोटापा बढ़ जाता है।
मोटापा बढ़ने के विभिन्न प्रतिकूल परिणाम देखे जा सकते हैं। इससे ओबेसिटी (Obesity) नामक रोग हो जाता है तथा मधुमेह जैसे रोग होने की आशंका हो जाती है। शरीर में मोटापा होने के कारण गुर्दों पर अधिक जोर पड़ता है तथा गुर्दे कमजोर पड़ने लगते हैं। वसा की अधिक मात्रा ग्रहण करने से पाचन क्रिया भी बिगड़ जाती है तथा अपच अथवा दस्त होने लगते हैं।

