अतिसार ( Diarrhoea )
यह रोग भी जीवाणुओं द्वारा तथा दूषित भोजन के माध्यम से शरीर के अन्दर पहुँचता है। यह रोग प्रायः बच्चों को होते हैं, परन्तु वयस्कों को भी यह रोग हो जाता है।
रोग का संवहन रोग के जीवाणुओं का संवहन जल तथा भोज माध्यम से होता है। जब गन्दे स्थानों से आने वाले मक्खी, मच्छर भोजन पर बैठते हैं तो ये लाये हुए जीवाणुओं को उसी पर छोड़ जाते हैं। इसी भोजन को जब हम खाते हैं तो ये जीवाणु पेट में प्रवेश करके रोग का कारण बनते हैं।
उद्भवन काल-
इन जीवाणुओं का उद्भवन काल 24 से 48 घण्टे तक का होता है तथा शरीर में प्रवेश पाने पर तीव्रता के साथ बढ़ते हैं।
प्रतिरक्षा-
शरीर में इसको रोकने के लिये सूक्ष्म रूप में प्रतिरक्षी पदार्थ आमाशय तथा अन्य अंगों में होते हैं। परन्तु जीवाणुओं की संख्या के बढ़ जाने पर ये पदार्थ निष्क्रिय हो जाते हैं।
अतिसार रोग के लक्षण
(ⅰ) अतिसार में भोजन नहीं पचता, एक दिन में 10 से 14 बार तक दस्त हो सकते हैं।
(ii) शरीर दुर्बल पड़ जाता है।
(iii) हाथ-पैर टूटने लगते हैं तथा जोड़ दुखने लगते हैं।
(iv) नेत्र सफेद पड़ने लगते हैं।
(v) खुश्की हो जाती है।
(vi) हल्का बुखार भी हो सकता है।
अतिसार रोग से बचने के उपचार -
(i) रोगी को उबालकर, ठण्डा करके जल देते रहना चाहिए, जिससे उसके शरीर में जल की कमी न हो सके ।
(ii) ग्लूकोज तथा मुसम्मी के रस को देना चाहिए जिससे उसमें अधिक कमजोरी न होने पाए।
(iii) रोगी को तुरन्त डॉक्टर को उचित दवा देनी चाहिए ।
(iv) वातावरण को शुद्ध रखना चाहिए तथा रोगी के गंदे वस्त्रों को तुरन्त गर्म पानी में उबालकर धो डालना चाहिए।
रोगीय अवस्था में दिया जाने वाला भोजन-
डॉक्टर के परामर्श के आधार पर ही भोजन देना चाहिए। जहाँ तक हो फल तथा उनसे निकलने वाले जूस आदि ही देने चाहिये । आवश्यकतानुसार उसे अन्य हल्के पेय पदार्थ भी दिये जा सकते हैं।
अतिसार रोग से बचने के उपाय-
यह रोग एक विशेष वातावरण में ही अधिक फैलता है। इसलिये उसमें उस समय संवाहित होने वाले माध्यम से बचाव करना चाहिए। इसको रोकने के लिए पहले से इसके इंजेक्शन लगवा लेने चाहिए, जिससे आक्रमण शरीर में अधिक घातक न हो। रोग से मुक्त हो जाने पर भी शक्तिवर्धक एवं ऊर्जायुक्त भोजन देना चाहिए। भोजन कार्बोज, प्रोटीन एवं विटामिन युक्त होना चाहिए।

