अधिगम के सिद्धांत: अर्थ, परिभाषा और अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक (Learning Theories in Hindi)

अधिगम एवं अधिगम के सिद्धांत

"अधिगम (Learning) क्या है और यह हमारे व्यवहार को कैसे बदलता है? मनोविज्ञान और शिक्षा शास्त्र (Pedagogy) में अधिगम एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसे 'अधिगम के सिद्धांतों' (Learning Theories) के माध्यम से समझा जा सकता है। एक शिक्षक या प्रतियोगी परीक्षा (CTET/UPTET) के अभ्यर्थी के रूप में, अधिगम के अर्थ, परिभाषा और इसे प्रभावित करने वाले कारकों का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। इस लेख में, हम अधिगम की जटिल अवधारणाओं को सबसे सरल भाषा में समझेंगे और उन प्रमुख सिद्धांतों पर चर्चा करेंगे जो न केवल परीक्षा में पूछे जाते हैं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में सीखने की प्रक्रिया को भी गहराई से प्रभावित करते हैं।"

अधिगम एवं अधिगम के सिद्धान्त अधिगम की अवधारणा 


सीखना आधुनिक बाल मनोविज्ञान की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण समस्या है। इसका क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत है। इसमें बालकों के अनुंबन्धन लेकर समस्या समाधान तक की सभी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। सीखने की क्रिया बालकों एवं वयस्कों के व्यवहार एवं मानसिक क्रियाओं के अनेक पहलुओं को प्रभावित करती है। 

मैक्गो (J.A. McGeoch, 1952) के अनुसार, "अभ्यास के कारण कार्य निष्पादन में परिवर्तन ही अधिगम है!"
हिल्गार्ड तथा एटकिन्सन (Hilgard and Atkhinson, 1967) के अनुसार, "लीखने को अभ्यास के व्यवहार में सापेक्ष स्थायी परिवर्तन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।"

अधिगम की कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाओं का विश्लेषण कर यह निष्कर्ष निकाला गया कि अधिगम व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी प्रगतिपूर्ण रूपान्तरण या परिवर्तन है। सीखने के द्वारा जीव नई प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करता है अथवा पुरानो प्रतिक्रियाओं की क्रियाशीलता को बढ़ाता है। व्यवहार में यह प्रगतिपूर्ण परिवर्तन अभ्यास, प्रशिक्षण या पूर्ण अनुभवों के कारण होते हैं (D.N. Srivastava, 1978) 

अधिगम की प्रकृति


अधिगम की प्रकृति के सम्बन्ध में अग्र बातें महत्वपूर्ण हो सकती हैं-

1) बालक चतुर्दिक वातावरण की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में सीखता रहता है, क्योंकि चतुर्दिक वातावरण में परिवर्तन होने के साथ ही व्यक्ति के व्यवहार में भी परिवर्तन होता है। बालक के चारों ओर के परिवेश का निर्माण भौतिक तत्वों, सामाजिक प्रभावों और परस्पर मानवीय सम्बन्धों से होने के कारण बालक सीखने की प्रक्रिया इन्हीं के बीच गतिशील होती है।
(2) जब बालक अपने मित्रों के साथ खेलता है तो उसके ऊपर उसके जीवन का प्रभाव पड़ता है।
(3) पुस्तकों को पढ़ने से बालक के व्यवहार में जो परिवर्तन होता है वह भी इस प्रकार का सीखना ही है।
(4) वातावरण में उत्तेजनाओं के कारण ही बालक व्यवहारगत अनुक्रियाएँ करता है और अनुभव से इन अनुक्रियाओं में परिवर्तन और परिमार्जन करता है। यह परिवर्तन व परिमार्जन सीखना कहलाता है। अतः अधिगम की प्रकृति के सम्बन्ध में तीन बातें स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं-

(i) सीखने से पूर्व की स्थिति, 
(ii) वातावरण या परिस्थितियों की उत्तेजनाएँ तथा 
(iii) व्यवहार में परिवर्तन या परिमार्जन।

अधिगम की प्रक्रिया


लक्ष्य प्राप्त करने के लिए व्यक्ति अनेक प्रकार की अनुक्रियाएँ करता है और जो क्रिया उपयुक्त होती है, उसी के द्वारा वह बाधाओं को पार करके लक्ष्य तक पहुँच जाता है। उपयुक्त क्रिया के द्वारा लक्ष्य प्राप्ति सीखने की प्रक्रिया को पूरा करता है। 

इस प्रकार सीखने की प्रक्रिया को सम्बद्ध सहज क्रिया द्वारा सीखना कहते हैं। "उत्तेजना और प्रतिक्रिया एक विशेष क्रम में बार-बार प्रस्तुत की जाने पर परस्पर सम्बन्धित हो जाती है और यही सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा सीखना कहलाने लगता है।"

अधिगम के सिद्धान्त


(1) स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धान्त

स्किनर महोदय ने सीखने के लिए सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन करने के लिए उन्होंने 1930 में सफेद चूहों का प्रयोग करके वांछित परिणाम निकाले। इन्होंने S प्रकार तथा R प्रकार के अधिगम में अन्तर इस प्रकार से किया है कि S प्रकार के अधिगम का सम्बन्ध पावलव के अधिगम सिद्धान्त से है जिसमें एक ज्ञात उद्दीपन को पुनर्बलन की स्थिति में एक अनुक्रिया से सम्बद्ध किया जाता है। इस प्रकार के अधिगम में अनुक्रिया उद्दीपन द्वारा उत्पन्न की जाती है जिसे अनुक्रियापरक व्यवहार कहते हैं। R प्रकार के अधिगम में निर्गमित का प्रयोग करते हैं और इसे क्रियापरक अनुक्रिया कहते हैं। अधिकेतर व्यवहार की प्रकृति सक्रिय होती है। प्राणी जब कोई अपेक्षित अनुक्रिया करता है तो इस अनुक्रिया के बाद जो पुनर्बल करने वाला उद्दीपन प्रस्तुत किया जाता है वह उस अनुक्रिया को अनुबन्धित अर्थात् प्रभावित करता है।

(2) सीखने का गेस्टाल्ट सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार सीखने में ज्ञान पूर्व रूप से सूझ से सम्बन्धित रहता है। व्यक्ति किसी विशेष को आंशिक रूप से नहीं अपितु पूर्ण रूप से सीखता है। सीखने में पूर्ण परिस्थिति का अवलोकन किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिगम को उत्तम स्वरूप प्रदान करने के लिए अपने प्रयत्नों को संगठित करने हेतु क्रियाशील रहता है। 

(3) क्षेत्रीय सिद्धान्त
यह सिद्धान्त लेविन महोदय द्वारा प्रतिपादित किया गया है। इनके अनुसार सीखने की क्रिया को समझने के लिए हमें यह केवल समझना होता है कि जीवन स्थल को नव-संगठन किस प्रकार से होता है तथा होते हैं-मनोवैज्ञानिक संसार की नवरचना किस प्रकार होती है। लेकिन सिद्धान्त में भर्त्सना, लक्ष्य तथा अवरोधक मुख्य तत्व हैं।

(4) गुथरी प्रतिस्थापन का सिद्धान्त

इसके द्वारा यह प्रतिपादित किया जाता है कि कार्य करते समय कोई उत्तेजक क्रियाशील होता है जब भविष्य में वही उत्तेजक किसी क्रिया को दोहराने वाला होगा। इनके अनुसार सीखना आवश्यक रूप से इन जन्मजात अथवा अर्जित प्रतिक्रियाओं का दूसरे प्रतिस्थापित को अपनाना चाहिए। उत्तेजकों की ओर विस्तारित करने की क्रिया है।

सीखने का पठार

सीखने की प्रक्रिया में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जिनमें काफी प्रयास करने के बावजूद भी सीखने की गति में कोई वृद्धि नहीं हो पाती है तो हम कहते हैं कि सीखने की प्रक्रिया में अवरोध पैदा हो गया। मनोविज्ञान में सीखने के इस प्रकार को सीखने का पठार कहकर पुकारते हैं। सीखने की प्रक्रिया में इस प्रकार के अवरोध अनेक बार उत्पन्न हो जाते हैं। सीखने के पठार प्रत्येक व्यक्ति में अनेक बार आते रहते हैं तथा इनका निवारण भी होता रहता है।

सीखने के पठार के कारण

सीखने की प्रक्रिया में बार-बार पठार का आ जाना या अवरोध उत्पन्न होना कुछ प्रमुख कारणों के द्वारा होता है जो नीचे निम्न प्रकार से व्यक्त किये जा रहे हैं-

(1) सीखने की अनुपयुक्त विधि को अपनाना।
(2) सीखने वाले विषय अथवा कार्य के स्वरूप को भलीभाँति न पहचानना।
(3) ऐसी आदत का बन जाना जो थकावट पैदा करती है।
(4) कार्य करने की परिस्थितियों का अनुकूलन न होना तथा वातावरण का दूषित होना जिससे ध्यान केन्द्रित न होना बताया गया है।
(5) व्यक्ति की बुद्धि-लब्धि में कमी आना।
(6) सीखने के नियम को स्थायी रूप से न अपनाना।
(7) सम्बन्धित कार्यों के प्रति व्यक्ति की रुचि एवं उत्साह में कमी आ जाना।

सीखने के पठार को दूर करने के उपाय


(i) यदि सीखने के विषय को सही नियम से सीखा जाय तो सीखने के पठार को रोका जा सकता है। 
(ii) शिक्षण में विविधता एवं रोचकता को अपनाये जाने से सीखने के पठार से बचाया जा सकता है। 
(iii) पठार हो जाने की स्थिति में सीखने की नवीन एवं रोचक विधियों अपनाना चाहिए। 
(iv) सीखने के कार्य के लिए आवश्यक प्रेरणा होनी चाहिए। प्रेरणा का यह कार्य शिक्षण द्वारा ही संभव हो सकता है।
(v) सीखने की क्रिया के मध्य होने वाली थकान को थोड़ा विश्राम करके फिर कार्य प्रारम्भ करने से अवरोध का पठार न होने से रोका जा सकता है।
(vi) सीखने की क्रिया के मध्य होने वाली थकान को थोड़ा विश्राम करके फिर कार्य प्रारम्भ करने से अवरोध का पठार न होने से रोका जा सकता है। 

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