क्रियात्मकता (Motor) का अर्थ, महत्व, सीमाएँ और विशेषताएँ

क्रियात्मकता (Motor) का अर्थ, महत्व, सीमाएँ और विशेषताएँ


क्रियात्मक विकास में विभिन्न क्रियात्मक योग्यताओं (Motor Abilities) के विकास तथा कौशलों (Skills) के विकास का अध्ययन किया जाता है। क्रियात्मक (Motor) शब्द को परिभाषित करते हुए जेम्स ड्रेवर (1968) ने लिखा है, इसका सम्बन्ध उन संरचना और कार्यों से है, जो माँसपेशियों की क्रियाओं से सम्बन्धित हैं अथवा इसका सम्बन्ध जीव की उस अनुक्रिया से है जो वह किसी परिस्थिति विशेष के प्रति करता है।


क्रियात्मक विकास के सम्बन्ध में हरलॉक (1974) ने लिखा है कि शरीर की विभिन्न माँसपेशियों पर नियन्त्रण का विकास ही क्रियात्मक विकास है। क्रो और क्रो (1961) ने क्रियात्मक योग्यताओं को परिभाषित करते हुए लिखा है कि क्रियात्मक योग्यताओं का तात्पर्य उन विभिन्न प्रकार की शारीरिक गतियों से है, जो कि नाड़ियों और माँसपेशियों के संयोजन के द्वारा सम्भव है।


उपर्युक्त तीनों परिभाषाओं का यदि विश्लेषण किया जाए तो तीनों ही परिभाषाओं का लगभग समान अर्थ है। यद्यपि पहली परिभाषा Motor शब्द की है, दूसरी क्रियात्मक विकास और तीसरी परिभाषा क्रियात्मक योग्यताओं की है। इन तीनों परिभाषाओं के आधार पर क्रियात्मक विकास (Motor Development) को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि बालक के शरीर की माँसपेशियों की क्रियाओं (या शारीरिक गतियों) पर नियन्त्रण का विकास ही क्रियात्मक विकास है। यह विकास नाड़ियों और मांसपेशियों के संयोजन के द्वारा ही संभव है।


क्रियात्मक विकास गर्भकालीन अवस्था (Prenatal Period) के तीसरे माह से ही प्रारम्भ हो जाता है। बालक के जन्म के बाद क्रियात्मक विकास की गति तीव्र हो जाती है। लगभग 6 वर्ष की अवस्था तक बालक अपनी अधिकांश माँसपेशियों की गतियों पर नियंत्रण करना सीख जाता है। बालक में क्रियात्मक योग्यताओं और क्रियात्मक कौशलों (Motor Skills) का विकास हो जाता है। इस विकास के फलस्वरूप बालक अपने चारों ओर के भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक वातावरण में गतिशील हो जाता है।


उसे इस प्रकार के विकास के कारण अपने चारों ओर के वातावरण में समायोजन करने में भी सुविधा होती है। जीवन में किसी भी प्रकार की सफलता को प्राप्त करने के लिए क्रियात्मक विकास की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बहुत आवश्यकता है। बालक की आयु बढ़ने के साथ-साथ उसमें क्रियात्मक विकास भी होता है। जन्म के समय वह एक इंच भी खिसक नहीं सकता है। परन्तु आयु बढ़ने के साथ-साथ वह खिसकना, चलना, दौड़ना, कूदना, उछलना, पेड़ पर चढ़ना, खाना, नहाना, कपड़े पहनना आदि कौशलों को सीखता जाता है।


क्रियात्मक विकास का महत्व ( Importance of Motor Development )


क्रियात्मक विकास का बालक के जीवन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बहुत महत्व है, जो निम्न प्रकार से है-


1. अच्छा स्वास्थ्य (Good Health)

बालक का क्रियात्मक विकास जितना अच्छा होगा, बालक में उतनी ही अधिक क्रियाशीलता होगी। अधिक क्रियाशीलता अच्छे स्वास्थ्य की परिचायक है। अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य वाले बच्चे मानसिक रूप से भी स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं। यदि बच्चे में क्रियात्मक योग्यताओं का विकास उपयुक्त मात्रा में नहीं होता है तो उसके खेल में साथी-समूह के बच्चे कम पसन्द करते हैं, अपने साथ खिलाना या खेलना पसन्द न करने के कारण बालक को समूह से कोई विशेष सन्तुष्टि प्राप्त नहीं होती है। अतः बालक का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बहुत कुछ बालक की क्रियात्मक योग्यताओं और कौशलों के विचार पर आधारित है।


2. अवांछित संवेगों को बाहर निकालना (Emotional Catharsis)

अधिक क्रियाशीलता के कारण बालक में संचित शक्ति व्यय हो जाती है। संचित शक्ति व्यय होने के साथ-साथ उसमें संचित अवांछित संवेग और चिन्ताएँ भी निकल जाती हैं। यह देखा गया है कि शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बालक जब अपने साथियों में खेलता है तो उसकी अवांछित चिन्ताएँ और संवेग अभिव्यक्त होकर निकल जाते हैं। फलस्वरूप वह इस प्रकार के कष्टदायक संवेगों और चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है।


3. समाजीकरण (Socialization)

अच्छा समाजीकरण बालकों के अच्छे क्रियात्मक विकास पर निर्भर करता है। अध्ययनों में देखा गया है कि सामाजिक कौशलों को सीखने के अवसर प्रायः उन्हीं बच्चों को मिल पाते हैं. जिनका क्रियात्मक विकास अच्छा होता है, उदाहरण के लिए-यदि एक बालक गेंद तीव्रता से नहीं खेल सकता है, तो उसके खेल के साथी उसका तिरस्कार करेंगे, उसका मजाक बनायेंगे। उसे अपने से छोटे बच्चों के साथ खेलना पड़ेगा, परन्तु वहाँ भी उसका मजाक और तिरस्कार हो सकता है। ऐसी अवस्था में बच्चा दूसरे अन्य बच्चों के साथ घुल-मिल नहीं पाता है और इस प्रकार वह सामाजिक मूल्यां और सामाजिक कौशलों को सीखने से वंचित रह जाता है। इस प्रकार से उसका समाजीकरण अपूर्ण रह जाता है। जो बच्चे खेलने, दौड़ने, कूदने आदि में होशियार होते हैं, उनके मित्र अधिक होते हैं। एक बालक के जितने ही मित्र अधिक होते हैं, उसका समाजीकरण उतना ही अच्छा और अधिक होता है।


4. आत्म-आनन्द (Self-Enterainment)

जब बालक की क्रियात्मक योग्यताओं और कौशलों का विकास अच्छा होता है, तब वह अनेक ऐसी क्रियाएँ या कौशलों का अभ्यास करता है जिनसे उसे आनन्द की प्राप्ति होती है इसके अतिरिक्त वह अपने कौशलों के कारण अपने मित्र में लोकप्रिय हो सकता है और उनमें अपने कौशलों की अभिव्यक्ति कर आत्म-सन्तुष्टि और आनन्द की प्राप्ति करता है।


5. आत्म-निर्भरता निर्भरता (Independence)

जन्म के समय बालक असहाय होता है। वह पूर्णतः दूसरों पर आश्रित होता है। क्रियात्मक योग्यताओं और कौशलों के विकास के साथ-साथ आत्मनिर्भर होता जाता है। धीरे-धीरे वह उठने-बैठने चलने लग जाता है और अपने हाथों में खाने-पीने, पहनने और नहाने आदि लग जाता है।


6. आत्म-प्रत्यय (Self-Concept)

जब बालक में अच्छी क्रियात्मक योग्यताओं और कौशलों का विकास होता है तब उसमें उपयुक्त मात्रा में शारीरिक सुरक्षा (Physical Security) तथा मनोवैज्ञानिक सुरक्षा की भावना जाग्रत होती है। फलस्वरूप उसमें पर्याप्त मात्रा में आत्म-विश्वास (Self-Confidence) की भावना उत्पन्न होती है। इस अवस्था में बालक में धनात्मकः आत्म-प्रत्यय का निर्माण होता है।


7. व्यक्तित्व में महत्वपूर्ण योगदान (Important Contribution to the Child's Personality)

बालक की क्रियात्मक योग्यताओं और कौशलों का विकास बालक के व्यक्तित्व को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करता है। अच्छे क्रियात्मक विकास की अवस्था में बालक का परिवार, खेल के साथियों और विद्यालय आदि सभी क्षेत्रों में समायोजन अच्छा रहता है। अच्छे समायोजन की अवस्था में बालक के व्यक्तित्व का विकास भी अच्छा होता है।


क्रियात्मक विकास की सीमाएँ ( Limitations of Motor Development )


बालक को स्वयं उसकी क्रियात्मक योग्यताओं के विकास और कौशलों के विकास से कुछ हानियाँ भी हो सकती हैं। बालक को अपनी ही क्रियात्मक योग्यताओं का विकास एक सीमा से अधिक हुआ हो, परन्तु इस प्रकार की हानियाँ केवल छः-सात वर्ष की अवस्था तक ही अधिक होती हैं। एक निश्चित आयु-विशेष में एक निश्चित मात्रा में ही क्रियात्मक विकास बालक के लिए हर प्रकार से लाभप्रद रहता है; उदाहरण के लिए एक बालक जो अपनी आयु को देखते हुए बहुत अधिक क्रियाशील है। अक्सर ऐसा बालक कुछ-न-कुछ दुर्घटनाएँ कर बैठता है। इन दुर्घटनाओं में वह अपना ही नुकसान नहीं करता है बल्कि वह परिवार की कुछ मूल्यवान चीजों का भी नुकसान कर बैठता है। इस नुकसान में वह अपने हाथ-पैरों आदि में चोट लगा सकता है और अपनी हरकतों से घर की चीजों को तोड़फोड़ सकता है।


अति क्रियात्मक विकास की एक हानि यह भी है कि बच्चों को अधिक्र क्रियाशीलता के कारण अधिक चोटें लगती हैं, हाथ-पैर टूटते हैं या घर की वस्तुओं को नुकसान पहुँचता है तो माता-पिता के लिए इस प्रकार के बालक एक समस्या बन जाते हैं। कई बार इन समस्यात्मक बच्चों के प्रति माता-पिता और परिवारीजनों की ऋणात्मक अभिवृत्तियाँ हो जाती हैं। संरक्षकों की यह ऋणात्मक अभिवृत्तियाँ बालक की खुशियों को कम कर देती हैं। उसके आत्म-प्रत्यय और व्यक्तित्व के विकास में असामान्यताएँ उत्पन्न होने लग जाती हैं। बालक की स्वतन्त्रता को भी माता-पिता की ऋणात्मक अभिवृत्तियाँ महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करती हैं।


क्रियात्मक विकास की विशेषताएँ ( Characteristics of Motor Development )


बालकों के क्रियात्मक विकास में अनेक ऐसी विशेषताएँ पाई जाती हैं, निम्न सामान्य रूप से सभी बालकों में पाई जाती हैं। इनमें से कुछ प्रमुख विशेषताएँ अग्र प्रकार से हैं-


1. निश्चित क्रम (Definite Sequence) - क्रियात्मक विकास के दो निश्चित क्रम हैं-


(1) मस्तकाधोमुखी क्रम (Cephalocaudal Sequence)

इस क्रम का अर्थ है कि बालक में क्रियांत्मक विकास पहले सिर के क्षेत्र में फिर क्रमशः मुख, गर्दन, धड़ और पैरों के क्षेत्र में होता है। जन्म के बाद आयु बढ़ने के साथ-साथ सिर के क्षेत्र में क्रियात्मक विकास पहले होता है। यदि एक माह के बालक को जमीन पर पेट के बल लिटाया जाय तो वह अपना सिर थोड़ा ऊपर उठा सकता है।


इसी प्रकार चार माह के बालक को यदि सहारा देकर बैठाया जाय तो वह अपने सिर को नियन्त्रित कर लेता है। बालक क्रमशः सिर उठाना, बैठना, घिसटकर चलना, खड़े होना, फिर पैरों के बल चल सीखता है। इन सभी क्रियाओं को यदि देखा जाय तो यह क्रियाएँ क्रमशः सिर मुखा → गर्दन धड़ → पैर के क्षेत्रों में उत्पन्न होती हैं। स्पष्ट है कि बालक में क्रियात्मक योग्यताओं का विकास मस्तकाधोमुखी क्रम में होता है।


(2) निकट-दूर क्रम (Proximodistal Sequence)

इस क्रम का अर्थ है कि बालक की सुषुम्ना नाड़ी (Spinal Cord or Main Axis) के पास स्थित क्षेत्रों में क्रियात्मक विकास पहले प्रारम्भ होता है और इस मुख्य अक्ष से दूर स्थित क्षेत्रों में विकास अपेक्षाकृत देर से प्रारम्भ होता है; उदाहरण के लिए-बालक अपने कन्धों पर नियन्त्रण करना पहले सीखता है, फिर कुहनियों पर और अन्त में कलाई और अंगुलियों पर। बालक में कन्धे उसकी मुख्य अक्ष के अपेक्षाकृत पास होते हैं, कुहनी, कलाई और अंगुलियाँ अपेक्षाकृत दूर होती हैं। बालक के हाथों में सुरक्षात्मक गतियाँ लगभग दो सप्ताह की अवस्था में ही देखी गई हैं। एक माह की अवस्था में बालक अँगूठा चूसने लग जाता है। चार महीने की अवस्था में वह चीजों को पकड़ने लग जाता है और आठ महीने की अवस्था तक वह कई चीजों में पसंद की वस्तुओं को चुनना शुरू कर देता है। 


2. क्रियात्मक विकास सामान्य से विशिष्ट क्रियाओं की ओर होता है (Motor Development Proceeds from General to Specific Responses)

बालकों के क्रियात्मक विकास को यदि देखा जाय तो प्रारम्प में उनमें सामान्य अनुक्रियाएँ उत्पन्न होती हैं तथा क्रियात्मक विकास के बढ़न के साथ-साथ उनमें विशिष्ट अनुक्रियाएँ उत्पन्न होती हैं; उदाहरण के लिए यदि एक पाँच महीने के बालक को सहारा देकर बैठाया जाय और उसके सामने एक खिलौना रखा जाय तो खिलौने को पकड़ने के प्रयास में वह खिलौने पर पेट के बल गिर पड़ता है। परन्तु शारीरिक विकास के साथ-साथ उसमें क्रियात्मक विकास बढ़ता जाता है और उसकी उद्दीपकों के प्रति अनुक्रियाएँ विशिष्ट हो जाती हैं। एक अवस्था ऐसी आती है कि बालक के सामने यदि खिलौना रखा जाता है तो सरलता से हाथों से खिलौना उठा ही नहीं लेता है बल्कि वह चतुरता के साथ खेल भी सकता है। अतः क्रियात्मक विकास में बालक पहले सामान्य अनुक्रियाएँ करता है और फिर विशिष्ट अनुक्रियाएँ करने लग जाता है। 


3. क्रियात्मक विकास बड़ी से छोटी माँसपेशियों की ओर होता है (Motor Development Proceeds from Large to Small Muscles)

क्रियात्मक्र विकास में यह देखा गया है कि शरीर की बड़ी माँसपेशियों पर बालक नियन्त्रण करना पहले सीखता है और शरीर की छोटी माँसपेशियों पर नियन्त्रण करना बांद में सीखता है; उदाहरण के लिए-बालक गेंद खेलना पहले सीखता है और यदि हारमोनियम बजाना सिखाया जाय तो वह बाद में या देर में सीख पाता है। क्योंकि गेंद खेलने में बड़ी माँसपेशियों की आवश्यकता होती है तथा हारमोनियम बजाने में छोटी माँसपेशियों की कुशलता भी अति आवश्यक है।


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