दूध जीवाणु विज्ञान
दूध एक बहुत महत्त्वपूर्ण आधार है। इसमें प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण तथा प्रमुख विटामिन्स आदि सभी तत्त्वों की उपस्थिति होती है। शिशुओं के लिए सम्पूर्ण आहार होता है तथा बाल्यावस्था में भी आहार में दूध का प्रमुख स्थान होता है।
विभिन्न जानवरों, जैसे-गाय, भैंस, बकरी आदि का दूध इसकी पूर्ति करता है। कुछ क्षेत्रों में ऊँट व भेड़ का दूध भी प्रयोग किया जाता है। दूध के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए इसका पूर्ण शुद्ध होना आवश्यक है, यद्यपि दूध की अशुद्धता की सम्भावनायें भी बहुत अधिक होती हैं। दूध की शुद्धता की जाँच करने के लिए चार विधियाँ विशेष रूप से प्रयोग की जाती हैं-
(1) भौतिक परीक्षण- दूध के रूप, गन्ध व स्वाद की जाँच करना।
(2) रासायनिक परीक्षण- दूध की रासायनिक रचना, वसा आदि की जाँच करना।
(3) स्वच्छता परीक्षण- पशु विज्ञान से संबंधित निरीक्षण ।
(4) अणुजीव परीक्षण- दूध जटिल एवं पोषक तत्त्वों युक्त भोज्य पदार्थ होने के कारण बैक्टीरिया व अन्य अणुजीव भी इसमें तेजी से वृद्धि करते हैं। दूध में इनके पहुँचने के साधन निम्नलिखित हो सकते हैं-
(1) जानवर के गोबर तथा थनों से (Udder and the Faeces of Animals)
(2) दूध दुहने वाला व्यक्ति या ग्वाला (मिल्कमैन)
(3) हवा (Air)
(4) गन्दे बर्तन
अणुजीवों में वृद्धि की गति तीव्र होने के कारण इनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ती जाती है। गर्मियों के मौसम में इनका गुणन (Multiplication) विशेष रूप से तेजी से होता है।
दूध में पाये जाने वाले अणुजीवों के प्रकार
दूध में उपस्थित बैक्टीरिया विभिन्न प्रकार के होते हैं। आसानी के लिए इन बैक्टीरिया को दो समूहों में विभाजित कर सकते हैं-
(1) प्राकृतिक रूप से उपस्थित सामान्य बैक्टीरिया जो कि मृतोपजीवी होते हैं।
(2) बैक्टीरिया, जो मनुष्य में रोग उत्पन्न करते हैं।
(1) सामान्य बैक्टीरिया
ये बैक्टीरिया मनुष्य में रोग उत्पन्न नहीं करते हैं, पर दूध में वृद्धि करके उसके रूप में परिवर्तन ला देते हैं। इससे कभी-कभी दूध ग्रहण करने की स्थिति में नहीं रहता है। यह बैक्टीरिया निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
(a) अम्ल उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया—
ये दूध को खट्टा कर देते हैं; जैसे-स्ट्रेप्टोकोकस लैक्टिस (Streptococcus lactis) व लैक्टोबेसीलाई (Lactobacilli) आदि। यह दूध के कार्बोहाइड्रेट लैक्टोज पर किण्वन क्रिया करके उसे लैक्टिक एसिड में परिवर्तित कर देते हैं। लैक्टिक एसिड दूध की प्रोटीन को जमा देता है तथा अघुलनशील केसीन में परिवर्तित कर देता है। इसे दही का जमना कहते हैं तथा दूध खट्टा हो जाता है।
(b) क्षार उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया
ये बैक्टीरिया; जैसे एल्केलीजेन्स (Alkaligens) दूध की वसा को साबुनीकृत कर देते हैं।
(c) प्रोटीन का विघटन करने वाले बैक्टीरिया
जैसे प्रोटियस (Proteus) तथा स्टैफिलोकोकाई (Staphylococci) आदि। ये प्रोटीन का विघटन कर दूध से द्रव (Whey) को अलग कर देते हैं।
(d) गैस उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया
जैसे क्लोस्ट्रीडियम बेल्काई (Clostridium welchi) तथा ई. कोलाई (E. coli or Escherichia coli), हवा के कोकाई (Air Cocci) आदि ।
(2) मनुष्य में रोग उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया (Pathogenic Bacteria) –
मनुष्य को विभिन्न रोग दूध में उपस्थित बैक्टीरिया के कारण होते हैं। बच्चे विशेष रूप से इन रोगों से पीड़ित रहते हैं क्योंकि दूध उनका प्रमुख आहार होता है तथा उनकी रोग निरोधक क्षमता कम होती है। दूध में ये बैक्टीरिया दूध दुहने वाले व्यक्ति के संक्रमण से पहुँच जाते हैं अथवा जानवर के शरीर में संक्रमण से दूध में पहुँच जाते हैं।
दूध दुहने वाले व्यक्ति से संक्रमण के द्वारा काफी बैक्टीरिया दूध में पहुँच सकते हैं-विशेष रूप से व्यक्ति के खाँसने अथवा छींकने की क्रिया के दौरान । विभिन्न रोग; जैसे-वर्ण-गला (Sore Throat), लाल ज्वर (Scarlet Fever), डिप्थीरिया (Diptheria), क्षय रोग (Tuberculosis) तथा पोलियो (Poliomyelitics) आदि इस विधि से दूसरे व्यक्तियों तथा बच्चों को हो जाते हैं। इन रोगों से बचने के लिए रोगी व्यक्ति से दूध से सम्बन्धित कार्य नहीं कराने चाहिए।
इसके अतिरिक्त रोगी जानवर के दूध का उपयोग करने से भी कई बैक्टीरिया रोग पहुँचाते हैं। क्षय रोगी जानवर के दूध में ट्यूबरकिल बेसीलस (Tubercle bacillus) बैक्टीरिया उपस्थित रहते हैं। इसी तरह अन्य बैक्टीरिया भी जानवर के शरीर से दूध में आ जाते हैं व रोग फैलाते हैं। दूध से उत्पन्न क्षय रोग के रोगियों की संख्या हमारे देश में बहुत अधिक है।
इस घटना से बचने के बराबर उपाय हो रहे हैं। जानवरों का पशु-चिकित्सालयों द्वारा बराबर उपचार व निरीक्षण हो रहा है। ट्यूबरकुलिन परीक्षण, बैक्टीरियोलोजीकल परीक्षण, दूध का पाश्चुराइजेशन आदि के द्वारा दूध में उत्पन्न संक्रमण की घटनाओं को कम कर रहा है। कच्चे दूध के द्वारा संक्रमण की घटना की अधिक सम्भावना होती है। अतः दूध उबालकर ही प्रयोग करना चाहिए।
दूध की जीवाणु जाँच
1. आरगेनोलैप्टिक जाँच
दूध को सुखाकर चखा जाता है तथा यह देखा जाता है कि उसमें खट्टापन तो नहीं है। दूध किस रंग का है? अधिक गुलाबी, अधिक पीला, लाल या हरा तो नहीं है।
2. वायबिल जीवाणु
प्लेट गणना इसमें बैक्टीरिया की संख्या 1 ग्रा. या 1 मि. ली. दूध अथवा उससे बनने वाले पदार्थ लेकर गिनी जाती हैं और उनकी शुद्ध दूध से तुलना की जाती है। नमूने के दूध को विभिन्न अनुपातों; जैसे- 1 मि. ली. दूध, 100 मि. ली. पानी, 1 मि. ली.: 100 मि. ली। 1 मि.ली. 1000 मि. ली. में पतला किया जाता है तथा फिर दूध को किसी माध्यम में डालकर 24 घण्टे बाद जीवाणु गिने जाते हैं। अच्छे दूध में 10,000-25,000 से अधिक जीवाणु एक घन सेण्टीमीटर में नहीं होने चाहिए।
3. कोलीफार्म परीक्षण-
मैकौन्की द्रव से भरी 11 टेस्ट ट्यूब ली जाती है और उनमें 1 मि. ली. दूध डाला जाता है तथा उन्हें बन्द करके 37°C तापक्रम पर 48 घण्टे रखा जाता है इसके पश्चात् अम्ल और गैस के लिए उन परखनलियों को देखा जाता है। अब यदि गैस तथा अम्ले वाली तथा बिना गैस व अम्ल वाली परखनलियों का अनुपात निकाला जाये और यदि यह 1/3 है तो दूध सन्तोषजनक है, यदि 2/4 है तो दूध असन्तोषजनक है।
4. विशिष्ट हानिकारक जीवाणुओं का परीक्षण-
दूध के द्वारा दो प्रकार की बीमारियाँ फैल सकती हैं-
(1) यह बीमारियाँ मनुष्य व जानवरों या केवल जानवरों में हो सकती हैं, जैसे-तपेदिक, क्यू ज्वर, बेवेलोसिस, जान्हस की बीमारी, मुँह तथा पैर का विषाणु ज्वर ।
(2) ये केवल मनुष्यों में होते हैं; जैसे टाइफाइड, सेप्टिक, गले में दर्द, डिप्थीरिया, पेचिश, हैजा । इन बीमारियों के जीवाणुओं के लिए प्रयोग किये जाते हैं।
5. दूध की गुणवत्ता की जाँच के लिए परीक्षण-
दूध कितने दिनों तक रखा जा सकता है, यह ज्ञात करने के लिए यह परीक्षण किया जाता है। यदि जीवाणु की संख्या अधिक है तो कम दिन रखा जा सकता है। इसके साथ-साथ मिथाइलीन ब्लू रिडकैटेस टैस्ट किया जाता है और देखा जाता है कि उबालने पर चक्का तो नहीं जमता। सूँघकर भी यह बात ज्ञात की जा सकती है।
6. दूध में उपस्थित तलछट के लिए परीक्षण
दूध की एक निश्चित मात्रा छलनी से निकाली जाती है और यह देखा जाता है कि कितनी गंदगी छानने पर रह गई है। अधिक गन्दगी मिलने का तात्पर्य है कि दूध की सफाई को ध्यान में रखकर नहीं निकाला गया है।
दूध किस प्रकार जीवाणुओं से सुरक्षित रखा जा सकता है तथा उसका संरक्षण-
1. दूध निकालने से लेकर उसे प्रयोग में लाने तक सफाई से रखा जाये जिससे कम जीवाणु हों तथा उसके रखने का समय बढ़ जाता है।
2. पाश्चुराइजेशन (Pasturization) - इस विधि द्वारा दूध को गर्म करने पर अधिकतर जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। यह विधि दो प्रकार की होती है-
(a) फ्लैश विधि
द्वारा दूध को 80°-85°C तक गर्म किया जाता है तथा. उसे इसी तापक्रम पर 30 सैकण्ड से 1 मिनट तक रखा जाता है फिर तत्काल ठण्डा कर बोतलों में भर दिया जाता है।
(b) होल्डर विधि-
इस विधि में दूध को 60°C से 65°C तापक्रम पर 2 घंटे तक रखा जाता है, तत्पश्चात् ठण्डा करके बोतलों में भर देते हैं। यह विधि अधिक अच्छी मानी गयी है क्योंकि यह दूध में उपस्थित करीब-करीब सभी यीस्ट (Yeast), मोल्ड (Mold) तथा स्पॉर (Spore) बनाने वाले जीवाणु को नष्ट कर देता है।

