सुपोषण ( eutrophication ) क्या है?

सुपोषण क्या है?


प्रत्येक मनुष्य को अपनी आयु, लिंग एवं कार्य आदि के अनुसार एक निश्चित मात्रा में आहार की आवश्यकता होती है। इस आहार में भोजन के अनिवार्य तत्व एक अनिश्चित अनुपात में होने आवश्यक हैं। यदि एक व्यक्ति को आहार के सभी तत्व समुचित मात्रा एवं अनुपात में प्राप्त होते रहते हैं तो उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है तथा शरीर की वृद्धि, विकास एवं रख-रखाव भी उचित प्रकार से होता है।


परन्तु विभिन्न कारणों से अनेक व्यक्तियों को इस प्रकार का आहार उपलब्ध नहीं हो पाता । आहार के अनिवार्य तत्वों की मात्रा तथा अनुपात के कम या अधिक या समुचित होने के आधार पर उचित पोषण, अपोषण तथा कुपोषण का वर्गीकरण किया जाता है।


उचित पोषण का अर्थ


उचित पोषण आहार प्राप्त करने की उस अवस्था को कहा जाता है जिसमें आहार के सभी कार्य एवं उद्देश्य सुचारु रूप से पूर्ण होते रहते हैं। उचित पोषण में भोजन की मात्रा एवं प्रकार इस प्रकार का होता है कि शरीर की समस्त आवश्यकताओं एवं क्रिया-कलापों के लिये पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाते हैं।


इस अवस्था में शरीर की समस्त कोशिकाओं का पोषण होता रहता है, शरीर की समस्त ग्रन्थियों में उचित मात्रा में रसों का निर्माण एवं स्राव होता रहता है, समस्त एन्जाइम उचित मात्रा में बनते रहते हैं। इसके अतिरिक्त शरीर की क्रियाओं के लिये ऊर्जा प्राप्त ( होती रहती है। शरीर में होने वाली टूट-फूट की मरम्मत भी होती रहती है। उचित पोषण की अवस्था में समस्त शारीरिक क्रियायें सुचारु रूप से चलती रहती हैं तथा शरीर का ढाँचा भी स्वस्थ एवं सुविकसित होता है।


उचित पोषण की विशेषताएँ


उचित पोषण का अनुमान शरीर को देखकर तथा उसकी क्रियाओं द्वारा लगाया क जा सकता है। अतः उचित पोषण के लक्षणों या विशेषताओं को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम वर्ग में उचित पोषण के प्रत्यक्ष लक्षण होते हैं तथा द्वितीय वर्ग में अप्रत्यक्ष लक्षण होते हैं। इन दोनों प्रकार के लक्षणों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-


(I) उचित पोषण के प्रत्यक्ष लक्षण


(1) उचित पोषण का एक प्रत्यक्ष लक्षण है- शरीर का वजन उचित होना। शरीर की लम्बाई के अनुपात में ही वजन होना चाहिये, परन्तु अन्य कारकों की अवहेलना करके केवल वजन के आधार पर उचित पोषण का निर्धारण नहीं किया जा सकता ।


(2) उचित पोषण वाले व्यक्ति के शरीर के अस्थि-कंकाल का समुचित विकास होता है। शरीर की लम्बी एवं सीधी अस्थियों में किसी प्रकार का आगे की तरफ या पीछे की तरफ झुकाव नहीं होता। विभिन्न हड्डियों के जोड़ ठीक तथा स्वाभाविक अवस्था में होते हैं। दाँत सुन्दर, मजबूत तथा स्वस्थ होते हैं। वक्ष-स्थल समुचित रूप में विकसित होता है तथा उसका स्वाभाविक फैलाव सम्भव होता है।


(3) उचित रूप से पोषण व्यक्ति के शरीर का ढाँचा सन्तुलित एवं सघा हुआ होता है।


(4) उचित पोषण के परिणामस्वरूप व्यक्ति की आँखों में एक प्रकार की चमक आ जाती है। उसकी आँखें प्रभावशाली प्रतीत होती हैं तथा आँखों के नीचे गहरे गड्ढे या काले निशान दिखाई नहीं देते।


(5) उचित पोषण का एक लक्षण सुसंगठित तथा सुविकसित माँसपेशियों का होना भी है। इससे शरीर सुन्दर भी दिखाई देता है।


(6) उचित ढंग से पोषित व्यक्ति के शरीर में वसा की पर्याप्त मात्रा एकत्रित होती है। वसा की एक अच्छी तह त्वचा के नीचे होती है।


(7) पोषण का एक लक्षण बालों को देखने से भी ज्ञात होता है। चिकने, घने, चमकीले तथा मुलायम बाल उचित पोषण के ही प्रतीक होते हैं।


(II) उचित पोषण के अप्रत्यक्ष लक्षण


(1) शरीर के सभी संस्थानों का उचित ढंग से कार्य करना उचित पोषण का एक अप्रत्यक्ष लक्षण है। इसे बाहरी तौर पर तो नहीं देखा जा सकता, परन्तु परीक्षण द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पाचन संस्थान, परिसंचरण संस्थान, स्नायु-संस्थान, श्वासोच्छवास-संस्थान तथा विसर्जन संस्थान का ठीक प्रकार से कार्य करना भी उचित पोषण का महत्वपूर्ण लक्षण है।


(2) उचित ढंग से पोषित व्यक्ति संवेगात्मक दृष्टि से स्थिर रहता है। संवेगात्मक अस्थिरता किसी न किसी प्रकार के विकार का प्रतीक होती है।


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