कार्बोहाइड्रेट चयापचय (Carbohydrate Metabolism)
कार्बोज मोनोसैकराइड के रूप में अवशोषित होकर यकृत में पहुँचता है, जहाँ पर सभी मोनोसैकराइड्स ग्लूकोज के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। आवश्यकतानुसार यह मोनोसैकराइड ऊर्जा देते हैं या ग्लाइकोजन के रूप में संग्रहीत हो जाते हैं। कार्बोहाइड्रेट के चयापचय को चार प्रमुख क्रियाओं में विभक्त किया जा सकता है।
रक्त में उपस्थित ग्लूकोज विभिन्न कोशिकाओं व ऊतकों के पोषण का कार्य करता है। जितनी तेजी से रक्त से ग्लूकोज कोशिकाओं व ऊतकों में चयापचय के लिए निकलता रहता है उसी तेजी से ही यकृत से ग्लूकोज रक्त में आता रहता है।
भूख की स्थिति में रक्त में ग्लूकोज की मात्रा 70 से 90 मिली ग्राम 1000 मिलीमीटर होती है। जैसे ही भोजन खाया जाता है, कुछ समय (उसके पाचन व अवशोषण) के बाद रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है। रक्त से यह ग्लूकोज यकृत में पहुँचता है। यकृत में ग्लूकोज व फ्रक्टोज फास्फोरस के साथ मिलकर ग्लायकोजेन का निर्माण करते हैं।
यकृत में ग्लाइकोजेन का निर्माण
फ्रक्टोज फॉस्फोरस के साथ मिलकर फ्रक्टोज-6-फॉस्फेट का निर्माण करता है जो कि ग्लूकोज-6-फॉस्फेट में परिवर्तित हो जाता है। इसी तरह गैलेक्टोज, गैलेक्टोज-1-फॉस्फेट में परिवर्तित होकर ग्लूकोज-1-फॉस्फेट में परिवर्तित हो जाता है। ग्लूकोज-1-फॉस्फेट तथा ग्लूकोज-6-फॉस्फेट यकृत में अग्नाशय के आइलेट्स ऑफ लैंगेरहांस (Islets of Langerhans) के हार्मोन इंसुलिन की उपस्थिति में लायकोजेन में परिवर्तित हो जाते हैं। ग्लूकोज का ग्लाइकोजेन में परिवर्तित होना ग्लाइकोजेनेसिस (Glycogenesis) कहलाता है।
ग्लाइकोजेनीलाइसिस (Glycogenolysis) -
ग्लाइकोजन एन्जाइम फॉस्फो-रेलेज के द्वारा टूटकर ग्लूकोज-1-फॉस्फेट में परिवर्तित हो जाता है। इस क्रिया को पूर्ण करने के लिए फॉस्फोरलेज एन्जाइम के साथ डीब्रान्चिग एन्जाइम भी सहायता करता है। फॉस्फोग्लूकोम्यूटेज विपरीत दिशा में क्रिया करके ग्लूकोज-6-फास्फेट का निर्माण करता है। ग्लूकोज-6-फॉस्फेट एन्जाइम द्वारा ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाता है।
ग्लाइकोलिसिस
यह क्रिया शरीर के प्रत्येक कोष में होती है और पाइरूबिक लैक्टिक अम्ल बनते हैं। ऑक्सीजन की उपस्थिति में पाइरूबिक अम्ल, सिट्रिक अम्र चक्र द्वारा पूर्ण रूप से आक्सीकृत कर दिया जाता है।
यह प्रक्रिया विभिन्न चरणों पर विभिन्न एन्जाइम की उपस्थिति में पूर्ण होती है। ग्लूकोज हैक्साकाइनेज के द्वारा ग्लूकोज-6-फॉस्फेट में परिवर्तित हो जाता है। इस क्रिया में ऊर्जा मुक्त होती हैं। ग्लूकोज-6-फॉस्फेट, फॉस्फेटहेक्सोज आइसोमरेस एन्जाइम द्वारा फ्रक्टोज-6-फॉस्फेट में परिवर्तित हो जाता है। पुनः ऊर्जा मुक्त कर फ्रक्टोज 1, 6 डाइफॉस्फेट का निर्माण होता है। यह पुनः एन्जाइम की उपस्थिति में दो भागों में विभक्त हो जाता है ग्लिसरेल्डिहाइड, 3-फॉस्फेट तथा डाइहाइड्रोक्सी एसीटोन फास्फेट। यह आप. में परिवर्तनशील हैं।
डाइहाइड्रोक्सी एसीटोन फॉस्फेट, ग्लिसरेल्डिहाइड 3-फॉस्फेट में परिवर्तित होकर 1, 3 डाइफासेग्लिसरेट के अणुओं का निर्माण करता है तथा मुक्त ऊर्जा ए.डी. पी. अणुओं द्वारा बाँध ली जाती है। अब यह पुनः दो अणु 3 फॉस्फोग्लिसरेट से परिवर्तित हो जाता है जो बाद में सूत्र 2 फॉस्फोग्लिसरेट में बदल जाता है। अन्त में पुनः एन्जाइम की उपस्थिति में परिवर्तन आते हैं और फॉस्फोऐनोल पाइरूबेट का निर्माण होता है। इसमें उपस्थित फॉस्फोरस ए. डी. पी. द्वारा ले लिया जाता है तथा 2 अणु एनोल पाइरूबेट बनता है जो परिवर्तितः-होकर पारूबिक अम्ल बनता है। इस पूरी प्रक्रिया में आठ अणु ए. टी. पी. के प्राप्त होते हैं।
सिटिक अम्ल चक्र (Citric Acid Cycle or Kreb's Cycle) -
सिट्रिक अम्ल चक्र में पाइरूबिक अम्ल आक्सीजन की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड, पानी और ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। यह क्रिया शरीर के सभी क्रियाशील कोषों में होती है।
पाइरूबिक 'अम्ल सिट्रिक अम्ल चक्र में जाने से पहले ऑक्सीडेटिव डीकार्बोलेशन के द्वारा एसीटाइल-को-एन्जाइम ए (Acetyl Co-enzyme A) में परिवर्तित होता है। यह अब आक्जेलो एसिटिक एसिड से जुड़कर सिट्रिक अम्ल बनाता है। यह क्रिया का प्रथम चरण है। क्रिया के अन्त में दुबारा आक्जैलो एसीटेट बनता है इस प्रकार यह चक्र पुनः शुरू हो जाता है। यह क्रिया भी विभिन्न चरणों पर विभिन्न एन्जाइम की उपस्थिति में पूर्ण होती है।
सिट्रेट, आइसोसिट्रेड में बदल जाता है। डीहाइड्रोजिनेज क्रिया द्वारा आइसोसिट्रेट, आक्जैलोसक्सिनेट में बदल जाता है। डीकार्बोक्सीलेशन क्रिया द्वारा इससे एल्फा कीटो ग्लूटरेट प्राप्त होता है तथा कार्बनडाइ-ऑक्साइड बाहर निकल जाती है। यह एन्जाइम्स, द्वारा सक्सीनाइल कोएन्जाइम ए में बदल जाता है जो कि बाद में सक्सीनेट में बदल जाता है। यह फ्यूमरेज में परिवर्तित हो जाता है जो कि मैलोज में एन्जाइम्स की उपस्थिति में बदल जाता है और मैलोज डीहाइड्रोजनेज द्वारा आक्सैलोएसीटेट में बदल जाता है तथा यह पुनः एसीटाइल कोएन्जाइम से जुड़कर चक्र शुरू कर देता है। इसी पूरी प्रक्रिया में 37 अणु ए. टी. पी. से निर्मित होते हैं।
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