गृह प्रबन्ध के प्रमुख तत्व
निकिल तथा डोरसी के अनुसार 'गृह प्रबन्ध के अन्तर्गत परिवार के साधनों का नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन आता है, जिसके द्वारा पारिवारिक उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है।
1. नियोजन :-
प्रबन्ध का सबसे अधिक महत्वपूर्ण चरण महत्व है। वास्तव में किसी भी कार्य को करने से पहले की जाने वाली तैयारी नियोजन है। नियोजन एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। किसी एक लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के उपरान्त किसी अन्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नियोजन प्रारम्भ हो जाता है। नियोजन की द्वितीय विशेषता है पूर्वानुमान ।
समस्या के समाधान के लिए निकटतम पूर्वानुमान करना भी सफलता के लिए आवश्यक है। नियोजन की तीसरी विशेषता है लचीलापन आवश्यकता तथा परिस्थितियों के अनुसार नियोजन में परिवर्तन करना उसका लचीलापन कहलाता है। नियोजन को क्रियान्वित करने में वैकल्पिक कार्यप्रणाली को चुना जा सकता है। प्रबन्धन की सफलता काफी हद तक नियोजन पर ही निर्भर करती है।
2. नियंत्रण
प्रबन्धन प्रक्रिया का द्वितीय तत्त्व नियन्त्रण है। केवल सही नियोजन द्वारा प्रक्रिया लक्ष्य तक नहीं पहुंचा जा सकता है। नियंत्रण के द्वारा अपनाई गई योजना को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार या सम्बन्धित परिस्थितियों के अनुकूल परिवर्तित कर क्रियन्वित किया जाता है। नियंत्रण को डगलस एस० शेरविन के इन शब्दों में स्पष्ट किया है "नियन्त्रण का मूल तत्त्व कार्यवाही है, जिसके द्वारा पूर्व निर्धारित स्तरों के अनुसार क्रियायों को समायोजित किया जाता है तथा इसके नियन्त्रण का आधार प्रबन्ध के पास सूचनाएँ होती हैं।"
यह कहा जा सकता है कि नियंत्रण के अन्तर्गत चालू योजना की कार्यप्रणाली से वर्तमान कार्यप्रणाली के विचलनों का सूक्ष्म निरीक्षण किया जाता है। नियंत्रण के ही अन्तर्गत समय और परिस्थितियाँ के अनुसार पूर्व निर्धारित योजना में किए जाने वाले परिवर्तनों का निर्णय किया जाता है।
प्रबन्धन की प्रक्रिया में नियन्त्रण की सफलता विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है। इसके लिए निरीक्षणकर्ता के पास उपर्युक्त जाँच यंत्र होने चाहिए तथा जांच में शीघ्रता की जानी चाहिए। जाँच के बाद आवश्यक निर्णय शीघ्र लेने चाहिए। इसके साथ ही नियंत्रण की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि सम्बन्धित योजनाएँ लचीली हो।
3. मूल्यांकन -
गृह प्रबन्ध का तीसरा तत्व मूल्यांकन है। पूर्व नियोजन के अनुसार किए गए कार्यों की सफलता-असफलता तथा उचित अनुचित के निर्णय करने के कार्य को मूल्यांकन कहा जाता है। मूल्यांकन द्वारा पहले हो चुकी गलतियों की जानकारी प्राप्त हो जाती है तथा भविष्य में उसी प्रकार की गलतियों को न दोहराने की चेतावनी मिल जाती है। इस प्रकार मूल्यांकन का विशेष महत्व है। गृह प्रबन्ध के दौरान किसी न किसी स्तर पर मूल्यांकन अवश्य किया जाता है। मूल्यांकन दो प्रकार का होता है: सापेक्ष मूल्यांकन और निरपेक्ष मूल्यांकन ।
4. पृष्ठ पोषण -
उपर्युक्त के आधार पर वांछित सुधार एवं परिवर्तन हेतु पृष्ठ पोषण किया जाता है जिससे गृह प्रबन्ध में आवश्यकतानुसार प्रवाह बना रह सकता है।

