कुपोषण || Malnutrition
पोषण की अव्यवस्था तथा अनुचित ढंग को कुपोषण (Mal-Nutrition) कहा जाता है। कुपोषण की अवस्था में या तो समुचित मात्रा एवं गुणों के अनुसार आहार नहीं मिल पाता अथवा आवश्यकता से अधिक मात्रा में आहार ग्रहण किया जाता है।
कहने का आशय यह है कि आहार का असन्तुलित होना अथवा अपर्याप्त होना अथवा आवश्यकता से अधिक होना ये सब कुपोषण की ही दशायें हैं। कुपोषण का प्रतिकूल प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य तथा वृद्धि एवं विकास पर पड़ता है। कुपोषण के परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। उदाहरण के लिये, रतौंधी, प्लूरिसी ब्रॉनकाइटिस, हृदय रोग, गाइटर आदि रोग सामान्य रूप से कुपोषण के ही परिणामस्वरूप होते हैं।
कुपोषण के कारण ( Causes of Malnutrition )
कुपोषण दो प्रकार के कारणों से हो सकता है। प्रथम अवस्था में आहार में पोषक तत्वों की कमी होती है तथा द्वितीय अवस्था में आहार में पोषक तत्वों की आवश्यकता से अधिक मात्रा होती है। कुपोषण के इन कारणों का विवरण निम्नलिखित है-
(1) पर्याप्त पोषक तत्वों का प्राप्त न होना
अविकसित तथा विकासशील देशों में कुपोषण की समस्या गंभीर होती है। इन देशों में कुपोषण का एक मुख्य कारण है पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों का प्राप्त न होना। भारतवर्ष में भी जनता की अधिकता के कारण पर्याप्त मात्रा में दूध, माँस, अण्डे तथा फल एवं सब्जियाँ उपलब्ध नहीं होतीं। अनाज की भी कमी बनी रहती है। खाद्य पदार्थों की यह कमी कुपोषण का एक कारण बनी रहती है।
(2) समुचित ज्ञान का अभाव
पोषक खाद्य पदार्थों का उपलब्ध होना हौ पर्याप्त नहीं, इसके साथ ही साथ आहार सम्बन्धी समुचित ज्ञान का होना भी आवश्यक है। पोषण के लिये सन्तुलित आहार सम्बन्धी ज्ञान अनिवार्य है। सन्तुलित आहार में आहार के सभी अनिवार्य तत्व सही मात्रा एवं अनुपात में होने चाहिये । इस प्रकार स्पष्ट है यदि आहार सम्बन्धी समुचित ज्ञान न हो तो पर्याप्त मात्रा में खाद्य-सामग्री होते हुये भी कुपोषण की अवस्था आ जाती है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुये प्रत्येक विकासशील देश में पोषण सम्बन्धी निर्देशन के लिये विभिन्न संस्थान एवं केन्द्र स्थापित किये जा रहे हैं।
(3) निम्न आर्थिक स्थिति
समुचित मात्रा में खाद्य सामग्री उपलब्ध होने तथा आहार सम्बन्धी ज्ञान होने पर भी कुपोषण की अवस्था आ सकती है। यह अवस्था तब आती है जब समाज में सामान्य व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होत्ती तथा उसकी क्रय शक्ति कम होती है। ऐसे में अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करते हुये व्यक्ति अल्प-शोषण से ही गुजारा चला लेता है तथा कुपोषण का शिकार बन जाता है। भारतवर्ष में भी कुपोषण का यह कारक काफी प्रबल है।
(4) आहार सम्बन्धी विशिष्ट आदतें
आहार सम्बन्धी कुछ विशिष्ट आदतों के परिणामस्वरूप भी कुपोषण की अवस्था आ सकती है। सभ्य मानव समाज में व्यक्ति की आहार सम्बन्धी आदतें विभिन्न कारकों द्वारा निर्धारित होती हैं। सांस्कृतिक, धार्मिक, पारिवारिक तथा भौगोलिक कारक व्यक्ति की आहार सम्बन्धी आदतों को निर्धारित करते हैं। इन कारणों के परिणामस्वरूप आहार सम्बन्धी कुछ ऐसी आदतें विकसित हो जाती हैं जो सन्तुलित एवं पर्याप्त आहार ग्रहण करने में बाधक होती हैं। उदाहरण के लिये, भारत में कुछ धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोग किसी स्थिति में माँस, मछली तथा अण्डा आदि ग्रहण नहीं करते। ऐसे व्यक्ति कुपोषण के शिकार हो सकते हैं।
(5) ओबेसिटी
कुपोषण का वर्णन करते हुये ओबेसिटी (Obesity) का उल्लेख करना भी अनिवार्य है। यह कुपोषण का वह रूप है जो आवश्यकता से अधिक मात्रा में आहार ग्रहण करने के परिणामस्वरूप होता है। जब व्यक्ति आवश्यकता से अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स ग्रहण करता है तो शरीर में वसा का अनुपात बढ़ जाता है तथा शरीर सामान्य से अधिक मोटा हो जाता है। यह कुपोषण की ही अवस्था है। इस प्रकार के कुपोषण के परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की हानियाँ हो सकती हैं।
(6) आथरोस्क्लोरोसिस
आवश्यकता से अधिक मात्रा में संतृप्त वसा ग्रहण करने के परिणामस्वरूप होने वाली कुपोषण की अवस्था को आथरोस्क्लोरोसिस (Atherosclerosis) कहते हैं। इस अवस्था में रक्त धमनियों में वसा एकत्र हो जाती है। इस वसा के एकत्र हो जाने के परिणामस्वरूप रक्त-धमनियों का मार्ग अवरुद्ध होने लगता है तथा रक्त के संचरण में बाधा होती है। इससे कभी-कभी हृदय की गति रुक जाने की भी आशंका रहती है।
(7) हाइपरविटामिनोसिस
आवश्यकता से अधिक आहार ग्रहण करने का एक उदाहरण हाइपरविटामिनोसिस (Hypervitaminosis) भी है। कुपोषण की यह अवस्था तब उत्पन्न होती है, जब आहार में विटामिन 'ए' तथा विटामिन 'डी' अधिक मात्रा में ग्रहण कर लिए जाते हैं।

