ताना भगत आंदोलन
ताना भगत आन्दोलन- बिरसा आन्दोलन के प्रभाव के कारण ताना भगत आन्दोलन विकसित हुआ। जतरा डरांव ताना भगत आन्दोलन के अग्रणी ना नेता थे, जो बहुत कुछ बिरसा के सिद्धान्त में मिलते-जुलते थे। ताना भगतों के आन्दोलनों को भी कई बार सरकार को दमन करना पड़ा। जनजातियों का यह आन्दोलन 1920-30 एक राष्ट्रीय आन्दोलन का महत्त्वपूर्ण अंग रहा। इस आन्दोलन के अनुयायी बड़ी निष्ठा से स्वतंत्रता संग्राम में जुट गए थे। ताना भगत बिहार की उरांव जनजाति का आन्दोलन था। प्रारम्भ में यह भी
एक समाज सुधार एवं धार्मिक आन्दोलन था। ताना भगत आन्दोलन के पीछे भी मुख्यतः भूमि समस्या और आर्थिक कारक थे। महात्मा गाँधी ने जब असहयोग आरम्भ किया जो मुण्डा गलत एवं उरांव जनजाति के लोगों ने उसका साथ दिया। सरकार द्वारा आन्तरिक सुरक्षा हेतु ताना भगत आन्दोलन को हानिकारक घोषित करके इस आन्दोलन के नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। दिसम्बर 1919 में कन्दू थाना के अन्तर्गत टीका गाँव में एक सभा करके ताना भक्तों की एक सभा में प्रस्ताव पास करके निर्णय लिया गया कि चौकीदारी कर एवं मालगुजारी देना बन्द कर देना चाहिए।
कांग्रेस के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने आकर इस आन्दोलन को स्वतन्त्रता आन्दोलन में सम्मिलित कर लिया सभी ताना भक्तों ने खादी पहनना एवं गाँधी टोपी पहनना आरम्भ कर दिया। इस आन्दोलन के अनुयायियों ने 1922 में कांग्रेस के नया आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग भी लिया। इस आन्दोलन के अनुयायियों द्वारा स्वतन्त्रता आन्दोलन भी पूर्ण योगदान दिया गया। मालगुजारी न देने के कारण ताना भक्तों की सा भूमि सरकार द्वारा छीन ली गई।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् एक विशेष कानून द्वारा ताना भक्तों की व भूमि वापिस कर दी गई, जो ब्रिटिश सरकार द्वारा छीनी गई थी। इस कानून कार नाम है-ताना भगत आन्दोलन कृषि भूमि पुनर्स्थापन नियम।

