गंगा एक्शन प्लान
देश में बाँध निर्माण के विरुद्ध जन चेतना युक्त आन्दोलन समय के साथ बढ़ता गया है। बाँध के बनने से जितना लाभ नहीं है, कालान्तर में उससे कहीं अधिक क्षति आस-पास के निवासियों को; कृषि और कृषि भूमि को पहुँचेगी। खेती की भूमि की उर्वरा शक्ति दिन-प्रतिदिन कम होती जायेगी। इस दृष्टि से बाँध निर्माण के विरुद्ध विरोध सर्वप्रथम 75 वर्ष पूर्व गंगा पर बाँध को लेकर हुआ था। कौशल किशोर कहते हैं कि "नर्मदा और हिटरी बाँधों के लिये जारी आन्दोलनों को देखकर आज से पचहत्तर वर्ष पर्व गंगा पर बाँध को लेकर हुआ।
वह संघर्ष याद आ जाता है, जो एक प्रकार से विश्व का पहला बाँध विरोधी आन्दोलन था। इससे पूर्व और बाद में दुनियाँ में जलधाराओं से सम्बन्धित कई आन्दोलन हुए, परन्तु हरिद्वार का आन्दोलन विश्व का प्रथम बाँध विरोधी सफल आन्दोलन कहा जा सकता है... वह दिन वस्तुतः अलौकिक रहा होगा, जब 1914 में देश की जानी मानी रियासतों की नंगी तलवारें बाँध को रोकने के लिए हर की पैड़ी पर लहरा उठी थीं। इक्कीश नरेशों ने अपने वाहनों पर सवार होकर महामना मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ दंदभी बजा दी। अखण्ड भारतवर्ष का राष्ट्रीय समाज एकमत से गंगा पर बन रहे बाँध के विरोध में उठ खड़ा हुआ।
गंगा बाँध बचाओ आन्दोलन ने जन समुदाय और पुरोहितों को भी आन्दोलन में आगे आने के लिये प्रेरित किया, क्योंकि गंगा नदी नहीं हैं भारत की संस्कृति और धर्म की प्रतीक हैं उसके प्रवाह को बाँधा कैसे जा सकता है? यह भारत की अस्मिता का प्रतीक है। जन-जन का यह नारा बन गया 'गंगा बंधकर बहेगी', 'बंधा हुआ जल मृतकों की अस्थियों के लिये', 'कुंभ की नगरी में बंधित जल' आदि नारों में गंगा बचाओ आन्दोलन को जन आन्दोलन के रूप में परिणित कर दिया।
राजा, महाराजा, नेता, समाज सेवक पुरोहित, बुद्धिजीवी सभी एकजुट होकर गंगा बचाओ आन्दोलन में शामिल हो गये। अन्ततः सरकार ने जन आन्दोलन के सम्मुख घुटने टेक दिये। लेकिन चालबाज अंग्रेज बाँध बनाने का प्रयास करते रहे और वे बार-बार मात खाते रहे। 1914-1916 का आन्दोलन भी ऐसा ही था।
मदन मोहन मालवीय जी की भूमिका इसमें सराहनीय थी। गंगा बचाओं आन्दोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं वरन् विश्व में अपनी पहचान बनायी। इससे प्रेरित होकर अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कुछ शहरों में भी बाँध विरोधी आन्दोलन किये गये।

