असहयोग आन्दोलन
महात्मा गाँधी प्रारंभ से ही विदेशी सत्ता के विरोधी थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ किए गए दुर्व्यवहार एवं रंगभेद की नीति के खिलाफ सफल संघर्ष किया। प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने पर वे 1915 ई. में भारत लौटे। उन्होंने विश्वयुद्ध ने अँग्रेजों को अपना समर्थन दिया। उनकी सेवाओं के बदले सरकार ने उन्हें 'कैसरे-हिन्द' की उपाधि से विभूषित भी किया।
असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व स्वयं गाँधी ने सँभाला। उन्होंने 'कैसरे-हिन्द' की सरकारी उपाधि लौटा दी। उनकी देखादेखी अनेक प्रभावशाली नेता इस आन्दोलन में शामिल हुए। कवविर रवीन्द्र नाथ ठाकुर सहित अनेक व्यक्तियों ने सरकारी उपाधियाँ लौटा दीं।
मोती लाल नेहरू, चितरंजन दास, राजेन्द्र प्रसाद जैसे प्रसिद्ध वकीलों ने वकालत छोड़ दी। हजारों छात्रों ने स्कूल-कालेजों से अपना नाता तोड़ लिया। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हुआ एवं विदेशी वस्त्रों होली जलाई गई, घर-घर में चर्खा की ध्वनि सुनाई पड़ने लगी।
1921 ई. तक असहयोग आन्दोलन ने व्यापक रूप धारण कर लिया। इस दौरान नवम्बर, 1921 ई. तक असहयोग आन्दोलन ने व्यापक रूप धारण कर लिया था। इसी दौरान, 1921 में युवराज प्रिंस आफ वेल्स बंबई पधारे। उनके आगमन के विरोध में जुलूस निकाले गए और हड़ताल रखी गई। इसे दबाने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिसमें अनेक व्यक्ति मारे गए।
सरकार ने आन्दोलनकारियों का दमन करने का निश्चय किया। 1921 ई. तक गाँधी को छोड़कर सभी नेता बंदी बना लिए गए। इसके बावजूद आंदोलन कमजोर नहीं पड़ा। फरवरी, 1922 ई. में गाँधी ने वायसराय को पत्र लिखकर चेतावनी दी - कि अगर सरकार अपना दमनचक्र बंद नहीं करेगी तो बाध्य होकर उन्हें बारदोली (गुजरात) में अपना नया आन्दोलन (सामूहिक सविनय अवज्ञा आन्दोलन) प्रारम्भ करना पड़ेगा।

