संथाल विद्रोह (Santhal rebellion) कब, क्यों और कैसे है?
संथाल विद्रोह ( Santhal rebellion ) अंग्रेज शासकों के विरुद्ध एक सशक्त विद्रोह था, जिसने संथालों समस्याओं पर विचार करने के लिये विवश कर दिया था, क्योंकि इनमें इतना भय कर गया था कि संथालों का सामना करने में वे अपने को असमर्थ पा रहे थे। भय एक कारण यह भी था कि अंग्रेज मारे जा रहे थे। संथालों द्वारा निलहे गोरों की ठियों पर कब्जा किया जा रहा था। इतना ही नहीं 20 हजार संथाली वीरों ने अमरपुर परगना पर आक्रमण कर वहाँ के राजा को राजभवन से खदेड़ दिया था। संथालों ने अनेक स्थानों पर कब्जा कर लिया। संथालों की महान् शक्ति और साहस ने अंग्रेजों को झकझोर कर रख दिया था। वे इतने आतंकित हो गए थे कि इनका सामना करने में डरते थे।
डॉ. ए. आर. एन. श्रीवास्तव संथालों के इस महा संग्राम का विश्लेषण करते हुए अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दो संथाल भाई सिदों व कान्हू संथालों को एकजुट करने हेतु सामने आये। "उन्होंने जन असन्तोष को नेतृत्व प्रदान किया। उन्होंने खुले रूप से कहना प्रारम्भ किया कि उन्हें उच्च प्राकृतिक आज्ञा मिली है कि अपने भाइयों को रास्ता दिखायें। उनका नारा था कि हमें सभी दिङ्क (विदेशी) को मार डालना चाहिए और स्वयं को ही शासक बनाना चाहिए। संथालों ने स्वयं को तीर धनुष, कुल्हाड़ी से सुसज्जित किया व साहूकारों को मारना शुरू किया। 1971 के संथाल विद्रोह का मुख्य परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश
सरकार ने 1855 के सुधारों को पुनः लागू करने का गम्भीर प्रयत्न किया।" अन्त में हताश, थकी-पिटी अंग्रेजी सरकार ने संथालों का दमन करने के लिए 10 नवम्बर, 1855 को बंगाल और बिहार के संथाल अचंलों को सेना के सुपुर्द दिया और संथालों में आतंक और भय उत्पन्न करने के लिये घोषणा की गई कि संस्थ के हाथों में हथियार देख्ने जायेंगे, उन्हें मौन की सजा दी जायेगी, क्योंकि वे अंग्रेज शासकों के शत्रु माने जायेंगे।
ब्रिटिश शासकों के पास अन्तिम हथियार यही था कि उपद्रवी और विद्रोही संथालों का सख्ती से दमन किया जाये। इन्हें कठोर से कठोर सजा दी ही न जाये, बल्कि इन्हें मृत्यु दण्ड का भी दण्ड दिया जाना चाहिए। इस नीति के तहत हजारों संथालों को बन्दी बना कर जेल में दूँस दिया गया। उन पर अत्याचार किये गये। आश्चर्य की बात यह है कि अनेक दबाव के बावजूद भी संथालों के विरुद्ध की गवाही देने को तैयार नहीं होता था।
यह अपने में जन शक्ति और सामूहिक भावना का उदाहरण था, जिसे सामान्यतः इतिहास के पन्नों में देखा नहीं जा सकता था। इसका अर्थ यह भी है कि संथाल विद्रोह अथवा आन्दोलन के पीछे अपार जनशक्ति की भावना छिपी थी। संथाल विद्रोह का एक सुखद परिणाम सामने आया कि संथाल परगना की स्थापना की गई।

