Environment Movement: पर्यावरण आंदोलन एक वैश्विक आंदोलन है विवेचना कीजिये

पर्यावरण आंदोलन एक वैश्विक आंदोलन है


संयुक्त राष्ट्र के भारतीय पर्यावरण सम्मेलन, जो 16 जून, 1972 में स्कॉटहोम में हुआ है, में यह निर्णय लिया गया था कि मानवीय पर्यावरण के संरक्षण और सुधार के लिए उचित कदम उठाये जायें। भारत गणराज्य के 37वें संसद द्वारा अग्रलिखित रूप में वह अधिनियम हो। इसके मुख्य बिन्दुओं की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है-


इस अधिनियम का विस्तार सम्पूर्ण भारत में किया गया। अधिनियम को अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न तिथियों में लागू करने का प्रावधान है। पर्यावरण के अन्तर्गत जलवायु और भूमि इनके अन्तः सम्बन्ध इनमें व्याप्त हैं। वे पर्यावरणीय चीजें जैसे द्रव्य, गैसीय पदार्थ जो पर्यावरण के लिए हानिकारक है, ऐसे रासायनिक या भौतिक रासायनिक पदार्थ जो मानव जीवन के लिए हानिकारक हों।


इस अधिनियम के दूसरे अध्याय में केन्द्रीय सरकार की शक्तियों का ब्यौरा मिलता है कि वह पर्यावरण और प्रदूषण की रोकथाम के लिए क्या कर सकती है। तीसरे अध्याय में पर्यावरण प्रदूषण का निवारण, नियन्त्रण और उपशमन की विवेचना की गई है। चौथा अध्याय में पर्यावरण सम्बन्धी अपराध की व्याख्या मिलती है कि किस तरह पर्यावरण के उल्लंघन करने वाले व्यक्ति है पर कार्यवाही की जानी चाहिए। शिवानन्द नौटियाल ने इन सभी चीजों की विस्तृत प व्याख्या की है।



पर्यावरण सम्बन्धी कानून


यद्यपि पर्यावरण को लेकर गत दो दशकों से जितनी चिन्ता व्यक्त की जा रही है, ही है, उतनी पहले नहीं थी पर इसका यह अर्थ नहीं कि भारतीय सरकार अथवा अंग्रेजी सरकार ने इस सम्बन्ध में कोई कार्यवाही न की हो। अनेक पर्यावरण सम्बन्धी कानून बनाये गये हैं। किन्तु पर्यावरण को लेकर जितनी जागरूकता समाज में आज उत्पन्न हुई, वह पहले नहीं थी। यदि पहले की समाज जागरूक हो गया होता तो पर्यावरण का यह जान लेवा रूप सामने नहीं आता। पर्यावरण को हानि न पहुँच सके इसलिए अंग्रेजों ने भी अनेक कानून बनाये।


उदाहरण के लिये-

1. भारतीय बन्दरगाह अधिनियम, (1901)

2. द बंगाल स्मोक न्यूसेंस ऐक्ट, (1905)

3. द इंग्लैण्ड स्टीम वेसटेज ऐक्ट, (1917)

4. द.ए.पी. एग्रीकल्चर, पेस्ट एण्ड डिसीज ऐक्ट, (1919)

5. द इण्डियन फारेस्ट ऐक्ट, (1927)

6. द मोटर वेहिकल ऐक्ट, (1938)

7. द दामोदर वैली कार्पोरेशन 'प्रिवेंशन - पोल्यूशन ऑफ वाटर' रेगुलेशन ऐक्ट, (1948)

8. द महाराष्ट्र प्रिवेशन ऑफ वाटर वोल्यूशन ऐक्ट, (1953)

9. द गुजरात स्मोरक न्यूसेंस ऐक्ट, (1956)

10. द वाइल्ड लाइफ ऐक्ट, (1972)

11. वाटर ऐक्ट, (1974)


वन जीवन कानून (1972) और जल कानून 1974 अनुच्छेद-252 के तहत बनाई गई प्रक्रिया के बाद बनाया गया। इस प्रक्रिया के तहत दो या ज्यादा राज्य किसी विषय पर प्रस्ताव पास करके संसद को उस पर कानून बनाने का अधिकार देते हैं। आयु कानून 1981 स्टॉकहोम में 1972 में मानवीय पर्यावरण सम्मेलन के फैसलों को लागू करने के लिए बनाया गया था। स्वास्थ्य मन्त्रालय ने जल प्रदूषण के अध्ययन के लिये 1962 में ही एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी। 1974 में यह विधेयक मंजूर किया गया। जल कानून का दायरा काफी बड़ा है। इसमें प्रदूषण मल, जल, कचरा, कारखानों का कचरा आदि की व्यापक परिभाषा दी गई है।


जल कानून 1974 के सेक्शन 24 (1) पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इस सेक्शन में प्रदूषण फैलाने वाले कचरे को जल स्त्रोतों या कुओं में बहाने पर रोक लगाने की बात कही गई है। जल स्त्रोतों के नैसर्गिक प्रवाह को कुप्रभावित करने या उसमें प्रदूषण फैलाने की जानबूझ कर कोशिश या कोशिस की अनुमति को अपराध करार दिया गया है।


ये सारे कानून इस बात के साक्षी हैं कि सरकार पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने के लिये प्रयासरत है किन्तु जनता में जनमानस में पर्यावरण को लेकर जो जागरूकता होनी चाहिए शायद वहअभी तक दिखाई नहीं पड़ रही है। यह है कि कानून भी हम बनाते हैं और तोड़ते भी हम नहीं है। हम पर्यावरण को सन्तुलित और अच्छा बनाने की बात करते हैं और अपने स्वार्थ और लाभ के लिए उसे मटमैला भी बनाते हैं और मन चाहे रूप में उसका दोहन भी करते हैं।


सरकार ने निःसन्देह पर्यावरण के महत्त्व को संविधान के निर्माण के समय ही आंक लिया था कि पर्यावरण पृथ्वी पर रहने वाली सभी जीवों के लिये अत्यन्त आवश्यक है। पर्यावरण यदि दूषित और असन्तुलित होता है तो सम्पूर्ण सामाजिक व भौगोलिक पर्यावरण मानव जाति के लिए और समाज के लिए हानिकारक बन जाता है। एक स्वस्थ और अच्छा पर्यावरण पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी प्रकार के जीव, जन्तु और मानव के लिए लाभप्रद होता है। इसलिए भारत के संविधान के अनुच्छेद-48 के पृष्ठ 14 पर कहा गया है-


"पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्द्धन और वन तथा अन्य जीवों की रक्षा राज्य देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्द्धन का और वन तथा अन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।"


संविधान के इस अनुच्छेद से स्पष्ट ज्ञात होता है कि पर्यावरण की रक्षा का दायित्व केन्द्र और राज्य की सरकारों पर है। यदि कोई व्यक्ति इसे अपने लाभके लिए प्रयोग करता है तो उसे विभिन्न धाराओं के अन्तर्गत दण्ड देने का प्रावधान है। इस तरह प्रत्यक्ष रूप में कहीं न कहीं पर्यावरण जागरूकता आन्दोलन में भारतीय संविधान भी है।


पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी सरकारी प्रयास


यह अत्यन्त प्रसन्नता की बात है कि पर्यावरण की भयावह स्थिति को देखकर केन्द्र और राज्य की सरकारों ने अनेक पर्यावरण सम्बन्धी कार्यक्रमों को अंजाम दिया है। इसका भी स्वाभाविक परिणाम है कि अखबार, मैंगजीन आदि पर्यावरण पर जनता को जागरूक करने की महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की है, वहीं सरकार को भी चेतावनी दी है कि यदि पर्यावरण को प्रदूषित होने से, समय रहते बचाया नहीं जाता तो सम्पूर्ण समाज में जन जीवन के लिए घातक सिद्ध होगा। निःसन्देह पर्यावरण जागरूकता आन्दोलन में समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और समाज-सेवी संस्थाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी सरकारी प्रयासों की गति में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।


पर्यावरण और वन मन्त्रालय विभिन्न पर्यावरण व वानिकी कार्यक्रमों के नियोजन संवर्द्धन, समन्वय और क्रियान्वयन की निगरानी के लिए भारत सरकार के प्रशासनिक ढाँचे में एक केन्द्रीय संस्था के रूप में कार्य करता है। मन्त्रालय को देश में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यू.एन.ई.पी.) अन्तर्राष्ट्रीय समन्वित पर्वत विकास केन्द्र (आई.सी.आई.एम.ओ.डी.) के लिए केन्द्रीय एजेंसी के रूप में नामित किया गया और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन (यू.एन.सी.ई.डी.) की अनुवर्ती कार्यवाही पर ध्यान देता है।..... वनस्पति जीव-जन्तुओं, वनों और वन्य जीवन का संरक्षण और संरक्षण, प्रदूषण की रोकथाम व नियन्त्रण, वनीकरण और अवक्रमित क्षेत्रों को फिर से हरा-भरा बनाना और पर्यावरण की रक्षा करना इस मन्त्रालय के उत्तरदायित्व हैं।


इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मन्त्रालय पर्यावरण प्रभावों का आंकलन परिस्थितिकीय पुनर्जीवन पर्यावरण एवं वन्य अनुसंधान को बढ़ावा देने, अध्ययन प्रशिक्षण तथा पर्यावरण जागरूकता उत्पन्न करने तथा पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी सभी वर्गों में मुहैया कराने का कार्य करता है।"


यह उद्धरण इस बात का प्रतीक है कि भारत सरकार पर्यावरण जागरूकता आन्दोलन को इस स्तर तक ले जाना चाहती है सामान्य व्यक्ति भी पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी प्राप्त कर ले और पर्यावरण की सुरक्षा, संवर्द्धन में अपना योगदान दे। यहाँ पर उचित होगा कि हम भारत सरकार के पर्यावरण सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण कार्यों की विवेचना करें। हम देखने का प्रयास भी करें कि इनका पर्यावरण जागरूकता आन्दोलन में किस स्तर पर भूमिका है। इस दृष्टि से भारत के कुछ महत्वपूर्ण पर्यावरण सम्बन्धी योजनायें निम्नलिखित हैं जिनका विवरण हमें भारत 2004 से प्राप्त हुआ है -


वन नीति और कानून

1944 में ही वन नीति लागू है। इसे 1952 और 1988 में शोधित किया गया है। इस नीति के तहत वनों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास किया गया है। इसका मुख्य लक्ष्य है पर्यावरण सन्तुलन को बनाये रखने और प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण करना।


प्रदूषण की रोकथाम

सन् 1992 में जारी प्रदूषण में कमी लाने के लिए नीतिगत बयान में भूमि, जल और वायु प्रदूषण पर नियन्त्रण और कमी लाने हेतु वित्तीय प्रोत्साहन, स्वैच्छिक अनुबन्धों और शिक्षा कार्यक्रमों और सूचना अभियानों का प्रावधान है। नीतिगत मुद्दे इस प्रकार हैं- साफ और कम कचरा उत्पन्न करने वाले प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहन करना। मल जल को पुनः प्रयोग करने हेतु रिसाइक्लिंग करना, जल की गुणवत्ता में सुधार लाना, पर्यावरण समीक्षा करना।


केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड

केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड का काम जल, और वायु प्रदूषण का परीक्षण करना, उसकी गुणवत्ता का आंकलन करना है। यह शीर्ष राष्ट्रीय संस्था है। बोर्ड पर जल प्रदूषण की रोकथाम और नियन्त्रण अधिनियम (1974), वायु प्रदूषण की रोकथाम का कार्यकारी दायित्व है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986) के प्रावधानों को लागू करने के लिए मन्त्रालय को तकनीकी सेवाएँ प्रदान करता है।...


खतरनाक पदार्थों का प्रबन्धक

खतरनाक अपशिष्ट प्रबन्धन विभाग अपशिष्ट और सूक्ष्म जैव पदार्थों और रसायनों के प्रबन्ध पर नियन्त्रण एवं नियोजन करने वाली केन्द्रीय एजेंसी है। ऐसे पदार्थों का प्रयोग करना जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण को किसी प्रकार की होनि न हो। ये गतिविधियाँ तीन प्रकार के मुख्य क्षेत्रों में प्रचलित की जाती हैं- रासायनिक सुरक्षा, खतरनाक अपशिष्टों तथा म्युनिसिपल ठोस अपशिष्ट पदार्थों का बेहतर प्रबन्धन।


इनको केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड तथा पर्यावरण और वन मन्त्रालय द्वारा लागू किया जाता है। इसी प्रकार अनेक समाज सेवी संस्थायें हैं जो पर्यावरण के सम्बन्ध में कार्य कर रही हैं। उन्हें सरकार प्रोत्साहित भी करती है और आर्थिक सहायता भी देती है। भार सरकार ने पर्यावरण सम्बन्धी अनेक संस्थाओं की स्थापना की है जो पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन करती है और उनके निराकरण हेतु सुझाव भी देती है।


अनुसंधान के द्वारा उन कार्यों को करने की सलाह भी देती है जिससे पर्यावरण समृद्ध बने और प्रदूषण रहित बन सके। यही कारण है कि किसी भी आयु वर्गों में पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षा चेतना और पर्यावरणीय सूचना प्रणाली तन्त्र के माध्यम से पर्यावरण जानकारी प्रदान करने को मन्त्रालय द्वारा प्राथमिकता दी जाती है। मन्त्रालय ने शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में पर्यावरण शिक्षा को अलग से तथा एक अनिवार्य विषय के रूप में शामिल करने की औपचारिक शिक्षा में सभी स्तरों पर महत्त्वपूर्ण पहल की है। ये सभी भारत सरकार के कार्यक्रम पर्यावरण जागरूकता आन्दोलन के अंश कहे जा सकते हैं।


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