Diagnostic Test: निदानात्मक परीक्षण का अर्थ एवं उद्देश्य

निदानात्मक परीक्षण का अर्थ एवं उद्देश्य - Meaning and purpose of diagnostic testing


निदानात्मक परीक्षण का अर्थ शाब्दिक रूप से निदानात्मक परीक्षण का अर्थ है एक ऐसा, परीक्षण या मूल्यांकन कार्यक्रम, जिसे किसी प्रकार के निदान हेतु प्रयुक्त किया जा सके। अगर कोई व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रूप से अस्वस्थ है तो उसे किसी न किसी प्रकार के निदानात्मक परीक्षण से गुजरना पड़ेगा।


बिल्कुल ऐसी ही बात शिक्षण के क्षेत्र में प्रयुक्त निदानात्मक परीक्षण से गुजरना पड़ेगा। बिल्कुल ऐसी ही बात शिक्षण के क्षेत्र में प्रयुक्त निदानात्मक परीक्षणों पर लागू होती है। पदार्थ विज्ञान शिक्षण के लिए निदानात्मक परीक्षण की जरूरत तभी पड़ती है जब किसी विद्यार्थी को पदार्थ विज्ञान सीखने में परेशानी हो।


पदार्थ विज्ञान में निदानात्मक परीक्षण से तात्पर्य एक ऐसे परीक्षण तथा मूल्यांकन कार्यक्रम से है जिसे पदार्थ विज्ञान अध्यापक द्वारा किसी विद्यार्थी विशेष या समूह विशेष के विद्यार्थी की अधिगम सम्बन्धी कठिनाइयों तथा व्यवहारगत समस्याओं की वास्तविक प्रकृति तथा उसके पीछे छिपे हुए कारणों का पता लगाने और फिर उनके जरिये एक ऐसा उपचारात्मक कार्यक्रम तैयार करने के लिए काम में लाया जाता है जिससे उन्हें उन योकम और सिम्पसन के अनुसार - "निदानात्मक परीक्षण वह साधन है जो शिक्षा के कारणों को व्यक्त करने के लिए निर्मित किया गया है।


मैंजिल के अनुसार निदानात्मक परीक्षणों का कार्य छात्रों का उनकी योग्यता के अनुसार वर्गीकरण करना नही है, बल्कि यह किसी विद्यालयी विषय में कमजोर छात्रों की कठिनाइयों का पता लगाता है, जिससे उस छात्र के लिए उपचारात्मक परीक्षण की व्यवस्था की जा सके।"


निदानात्मक परीक्षण के उद्देश्य - Objectives of Diagnostic Testing


निदानात्मक परीक्षण किसी छात्र की योग्यता के सभी पहलुओं की भाप करते हैं, इनकी प्रमुख त्रुटियों को बताते हैं। इनके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं -


1. विद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले विषयों की शिंक्षण अधिगम प्रक्रिया में सुधार लाना ।

2. विद्यालय में पढ़ाये जाने वाले विभिन्न विषयों के मौलिक तत्वों से विचलित अध्यापन पद्धतियों की कमियों को ढूढ़ना या उनमें सुधार हेतु दिशा-निर्देश देना।

3. किसी विषय में पिछड़े हुए बालकों को पहचानना, उनकी विशिष्ट कमजोरियों का पता लगाना तथा उन कमजोरियों को दूर करने का उपचारात्मक सुझाव देना।

4. निदानात्मक परीक्षण, उपलब्धि परीक्षण हेतु परीक्षण पदों के प्रकार निर्धारित करने में सहायता प्रदान करता है।

5. निदानात्मक परीक्षण से प्राप्त परिणामों के आधार पर पाठ्य सामग्री में सुधार किया जाता है।

6. निदानात्मक परीक्षण द्वारा छात्रों के अधिगम संबंधी कठिनाइयों का ज्ञान हो जाता है। इससे अध्यापक को एक दिशा मिलती है। वह छात्र की कठिनाईयों को ध्यान में रखकर अपनी शिक्षण विधियों में सुधार लाता है।

7. निदानात्मक परीक्षण छात्र के किसी विशिष्ट कौशल की कमियों की ओर संकेत करता है। इसका मुख्य उद्देश्य उस विशिष्ट अधिगम के क्षेत्र को इंगित करना है, जहां पर कुछ विशिष्ट प्रकार के अनुदेशन की आवश्यकता होती है।

8. टीगस के अनुसार निदानात्मक परीक्षण का उद्देश्य सदैव विशिष्ट शिक्षण से युक्तियों को प्रदान करना है, जिससे छात्र वचित अधिगम को प्राप्त कर सके।


उपचारात्मक शिक्षण - Remedial teaching


उपचारात्मक शिक्षण, जैसा कि इसके नाम से विदित होता है, एक इस प्रकार का शिक्षक या उपचारात्मक कार्य होता है जिसे किसी एक विद्यार्थी या विद्यार्थियों का समूह विशेष के किसी विषय के अधिगम से सम्बन्धित कोई एक विशेष कठिनाई, कमजोरी या समस्या (विशिष्ट या सामूहिक) जिसका किसी निदानात्मक माध्यमों से पता चलता हो का निवारण करने के लिए काम में लाया जाता है।


इस तरह किसी भी प्रकार के उपचारात्मक शिक्षण का मुख्य आधार वे निदानात्मक प्रयत्न होते है जिन्हें इस विषय उद्देश्य के लिए किया जाता है कि अधिगम कार्य में जिस तरह की परेशानियों कठिनाईयों तथा कमजोरियों का सामना अधिगमकर्ता को करना पड़ता है, उनके बारे में ठीक-2 निदान किया जा सके।


जितनी अच्छी तरह से ये निदानात्मक प्रयत्न किये जाते है उनके फलस्वरूप जितनी अच्छी तरह से निदानात्मक परिणाम प्राप्त होंगें, छात्र की अधिगम कठिनाई, कमजोरी तथा परेशानी से मुक्त दिलाने हेतु अच्छे ढंग से उपचारात्मक शिक्षण का नियोजन एवं क्रियान्वयन किया जा सके।


अतः यह कथन कि जैसा निदान होता है, उपचार भी वैसे ही किया जाता है, सभी अर्थो में खरा उतरता है। जीवन विज्ञान के क्षेत्र में निदानात्मक कार्य के समाप्त होने के बाद शिक्षक का दायित्व है कि छात्रों को उपचारात्मक शिक्षण देने की व्यवस्था करें।


क्योंकि छात्र की कमजोरी ज्ञात होने के बाद उसका उपचार करना आसान हो जाता है। जीव विज्ञान शिक्षण करते समय शिक्षक का कर्तव्य है कि प्रत्येक अध्याय की समाप्ति पर छात्रों का निदान करे ताकि शीघ्र ही उनकी कमजोरी का शीघ्र उपचार नहीं किया जाता है तो वह आगे सीखने में रुकावट पैदा करेगी।

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