माध्यमिक स्तर पर गृह विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य क्या है?
आधुनिक युग में विद्यालयों में छात्राओं की गृह-विज्ञान की शिक्षा देना अत्यधिक महत्वपूर्ण है, गृह विज्ञान के शिक्षण को प्रभावोत्पादक एवं बोधगम्य बनाने की दृष्टि से इनके उद्देश्य नितान्त आवश्यक है। सुविचरित एवं उपयोगी उद्देश्यों के अभाव में विषय का शिक्षण नीरस एवं अव्यावहारिक हो जाता हैं शिक्षण का सामान्य उद्देश्य व्यक्ति को सच्चरित्र, शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से स्वस्थ तथा परिवार का सुयोग्य एवं आत्मनिर्भर सदस्य बनाना है। "उद्देश्य यथार्थ रूप में वह कथन होता है जो वांछित व्यावहारिक परिवर्तनों की ओर इंगित करता है। उद्देश्य दो प्रकार का होता है।
1. शैक्षिक उद्देश्य (Educational Objectives)
2. शिक्षण उद्देश्य (Instructional Objectives)
शैक्षिक उद्देश्य का सम्बन्ध उन वांछित व्यावहारिक परिवर्तनों से होता है, जिनका क्षेत्र व्यापक विस्तृत एवं सामान्य होता है इनका आधार दार्शनिक होता है। यह शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में प्रत्यक्षतः सम्बन्धित नहीं होते अपितु इनका प्रकृक्ति औपचारिक अप्रत्यक्ष एवं सैद्धान्तिक होती है। इनको प्राप्त करने के लिए लम्बी अवधि की आवश्यकता होती है।
शिक्षण उद्देश्यों को सम्बन्ध उन वांछित व्यवहार परिवर्तनों से होता है जिनका क्षेत्र सीमित, निश्चित तथा विशिष्ट होता है। इनको मनोविज्ञान आधार प्रदान करता है। यह शिक्षण अधिगम प्रक्रिया से प्रत्यक्षतः सम्बन्धित होता हैं यह क्रियात्मक, व्यावहारिक एवं प्रत्यक्ष होते है। इनकी प्राप्ति विद्यालय के छोटे कालांश मे भी सम्भव है।
N.C.E.R.T ने शिक्षण उद्देश्यों को इस प्रकार स्पष्ट किया है "उद्देश्य वह बिन्दु है जिसकी दिशा में कार्य किया जाता है। वह व्यवस्थित परिवर्तन है जिसे किसी क्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है, जिसके लिये हम कार्य करते है।
"An Objective is a point or eindviw of something towards which action is directed, a planned change sought through any activity what we set out to do" बी० एस० ब्लूम ने शिक्षण उद्देश्य की परिभाषा इस प्रकार दी है -
"शैक्षिक उद्देश्य वह लक्ष्य मात्र ही नहीं होते है जिनकी सहायता से पाठ्यक्रम को निर्मित किया जाता है। वे अनुदेशन के लिए निर्देशन दिया जाता हो बल्कि वह मूल्यांकन की तकनीक की रचना के विशिष्ट करण में भी सहायक होता है।"
"शैक्षिक उद्देश्य न केवल वे लक्ष्य हैं जिनके लिए पाठ्यक्रम को आकार दिया जाता है और जिनके लिए शिक्षण निर्देशित किया जाता है, बल्कि वे हैं साथ ही लक्ष्य भी निर्धारित किए गए हैं जो मूल्यांकन तकनीकों के निर्माण और उपयोग के लिए विस्तृत विनिर्देश प्रदान करते हैं।"
1959 में अमरीकी होम इकोनोमिक्स एसोसियेशन द्वारा स्थापित एक समिति ने गृह-विहान शिक्षण के उद्देश्यों को इ शब्दों में व्यकत किया "हम विश्वस करते है कि गृह विज्ञान की सबसे स्पष्ट एवं नवीन दिशा यह होगी कि वह बालिकाओं में उन मौलिक योग्यताओं को विकसित करने में योग दे जो उनके पारिवारिक जीवन हेतु प्रभावी हो गया जो वैयक्तिक एवं पारिवारिक परिस्थितियों में भिन्नता होते हुए भी उनके व्यक्तिगत और परिवार के जीवन में सफलता प्रदान करें ।
ऑलाइव ए. हॉल तथा बीटराइ पॉल्यूकिल (Olive A Hall and Beatries Paolucele) अपनी पुस्तक 'टीचिंग हॉम इकोनोमिक्स में गृह विज्ञान शिक्षण के निम्न उद्देश्य दिये है -
1. परिवार के सदस्यों की वृद्धि एवं विकास हेतु उपयुक्त पर्यावरण का निर्माण करना।
2. छात्राओं में परिवार तथा समाज के सदस्यों के मध्य स्वस्थ सम्बन्धों को स्थापित करने की क्षमता विकसित करना।
3. आर्थिक सुरक्षा हेतु दीर्घकालीन लक्ष्यों का निर्धारण एवं उन्हें प्राप्त करने के प्रयत्न करना।
4. आर्थिक साधनों का विवेकपूर्ण ढंग से प्रयोग करने की दृष्टि से उपभोग की सामग्री की सफल योजना बनाना ।
5. गृह सम्बन्धी समस्त कार्यों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने की कुशलता को विकसित करना
6. अवकाश के क्षणों का प्रयोग मानवीय एवं कलात्मक क्रियाकलापों में रुचि व कुशलता का विकास कर सृजनात्मक एवं सुन्दर ढंग से प्रयोग करना।
7. सामाजिक संस्थाओं एवं समितियों के द्वारा आयोजित परिवार कल्याण सम्बन्धी क्रियाकलापों में योग देने योग्य बनाना ।
8. समाज को विभिन्न संस्कृतियों एवं रहन-सहन के तरीकों के प्रति सम्मानात्मक एवं प्रशंसात्मक भावना का विकास करना तथा पारस्परिक सहयोग की कुशलता का विकास करना । दिल्ली स्थिति लेडी इरवनि कालेज में आयोजित एक संगोष्ठी में गृह-विज्ञान शिक्षण के उद्देश्यों पर विचार-विमर्श करते हुए यह तय किया गया कि गृह
गृह विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य - Objectives of Home Science Education
1. छात्राओं के स्वस्थ एवं बहुमुखी व्यक्तित्व का विकास करना ।
2. उनको पारिवारिक जीवन के महत्व के प्रति जागरूक बनाना एवं उन्हें उन सिद्धान्तों, रुचियों एवं कौशलों से सुसज्जित करना जो उत्तम गृह एवं परिवार के विकास में सहायक हो।
3. उन्हें समाज में प्रचलित परम्पराओं, रीति रिवाजो एवं संस्कृति से परिचित करते हुए उनका मूल्यांकन करने के लिए प्रोत्साहित करना।
4. उन्हें मानव जीवन के यथार्थ अर्थ को समझने की क्षमता विकसित करना तथा व्यस्थित नैतिक जीवन को महत्व से परिचित करना ।
वर्तमान भारतीय परिस्थितियों में माध्यमिक स्तर पर गृह-विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य निम्नानुसार निर्धारित किए जा सकते है -
1. उत्तरदायित्व की भावना का विकास
'गृह' समाज की प्रारम्भिक एवं आधारभूत इकाई है। प्रत्येक छात्रा को पूर्ण ज्ञान होना चाहिए कि गृह के प्रति उसके क्या कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व है। उस भावना के विकसित होने पर ही वे परिवार के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण करने की ओर अग्रसर हो सकेगी।
2. सन्तोष की भावना की विकास
सन्तोष की भावना का जीवन में अत्यधिक महत्व है। कहा जाता है 'सन्तोषी सदा सुखी।' गृह-विज्ञान की छात्राओं को यह सिखाया जाना चाहिए कि उपलब्ध साधनों का उपयोग अधिकतम सन्तुष्टि के लिए कैसे किया जाये। व्यक्ति जब अपने सीमित साधनों का अधिकतम सम्भव उपयोगिता प्राप्त कर लेता है तो वह सुख तथा सन्तोष का अनुभव प्राप्त कर लेता है। जिस व्यक्ति के अन्दर सन्तोष की भावना पर्याप्त रूप से विकसित हो जाती है वह जीवन में मानसिक द्वन्दों, ईर्ष्या द्वेष निराशा आदि अवगुणों से बचा रहता है।
3. सामाजिक एवं नैतिक गुणों का विकास
जीवन की सफलता स्वस्थ एवं मधुर सामाजिक सम्बन्धों पर बहुत कुछ निर्भर करती है। छात्राओं को गृह-विज्ञान के द्वारा उन समस्त गुणों से विभूषित करना चाहिए जो कि स्वस्थ सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने में विशेष रूप से सहायक होते है। जब छात्राएं व्यावहारिक विषयों में एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करती है तो वे आवश्यकतानुसार एक-दूसरे को सहयोग देती है तथा पारस्परिक प्रेम की बुद्धि के लिए एक दूसरे की मनोवृत्तियों का सम्मान, प्रेम, सद्भाव, सहयोग, संयम निःस्वार्थ भाव, आदि सामाजिक गुणों का विकास करती हैं।
4. स्वास्थ सम्बन्धी अच्छी आदतों का विकास
स्वास्थ वर्द्धक तथा शारीरिक आवश्यकतानुसार भोजन मनुष्य को स्वस्थ रहने के महत्वपूर्ण है। छात्राएं शरीर एवं स्वास्थ विज्ञान का ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य को भोजन तथा पाक शास्त्र के ज्ञान द्वारा वे अल्प व्यय करके ऐसे स्वास्थप्रद भोजन का आयोजन कर सकती है जिससे परिवार के लोगों का उत्तम स्वास्थय बन सके।
5. आत्म-निर्भरता एवं आत्मविश्वास की भावना का विकास
इस उद्देश्य की दृष्टि से गृह-विज्ञान छात्राओं को समस्त गृह सम्बन्धी कार्यों को कुशलता पूर्वक सम्पन्न करने के अवसर प्रदान करता है। इसकी शिक्षा द्वारा छात्राओं का स्वास्थ के उन नियमों से अवगत कराया जाता है तथा यह गृह करने की उन कुशल विधियों का बोध कराया जाता है जो उनके तथा परिजनों के स्वास्थ्य को उत्तम रखने में सहायक होती है। सिलाई-कढ़ाई के शिक्षण द्वारा अपने बच्चों के कपड़े स्वयं सिलकर कपड़े का सदुप्रयोग तथा धन की बचत कर सकती है। धुलाई सीखकर दैनिक प्रयोग में आने वाले सूती रेशमी तथा उनी कपड़ों को स्वयं धो लेती है। गृह सम्बन्धी को समस्त कार्यों में कुशलता प्रदान करने पर वे आत्मविश्वासी बन जाती है।
6. गृह सुव्यवस्था सम्बन्धी समस्त कौशल का विकास
सुव्यवस्थित एवं सुसज्जित 'गृह' सुखी और शान्तिमय जीवन का प्रतीक है। गृहणी के प्रयलों की सार्थकता सुव्यवस्थित गृह का निर्माण करने में है। गृह विज्ञान में छात्राओं को घर के बाहर पर्यावरण को सजाकर आकर्षक बनाने का व्यावहारिक ज्ञान दिया जाता है। इसके अतिरिक्त गृह सम्बन्धी विभिन्न क्रियाकलापों सिलाई, गुलाई खाना पकाना आदि को सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न करने के कौशल का विकास करने के पर्याप्त अवसर एवं अनुभव प्राप्त होते है। इस प्रकार छात्रा गृह व्यवस्था कला से भली-भांति परिचित हो जाती है।
7. कलात्मक अभिव्यक्ति का विकास:
गृह विज्ञान कलात्मक उद्देश्यों की पूर्ति का साधन है। इस दृष्टि से यह छात्राओं के व्यक्तित्व का निर्माण करता है मानव को जीवित रहने की प्रेरणा देता है, सौन्दर्यानुभूति का संचार करता है, गृह विज्ञान शिक्षण द्वारा शिक्षिका छात्राओं में कलात्मक गुणों को जागृत करती है। गृह स्वच्छता सजावट, सुरक्षा सुव्यवस्था एवं गृह संचालन आदि के अध्ययन में छात्राओं को कलात्मक पक्ष की अभिव्यक्ति करने के अवसर प्राप्त होते है। कला प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सरलता एवं उत्साह को प्रेरित करती है।
8. सांस्कृतिक मूल्यों का विकास
'संस्कृति' मानव जाति की अनुपम निधि है। इसकी वास्तविक सुरक्षा घरों में ही होती है। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति विश्व में आदर्श एवं अनुकरणीय रही है। छात्राओं में सांस्कृतिक विकास में गृह-विज्ञान शिक्षण का बहुत महत्वपूर्ण सहयोग है। बालिकाओं में सांस्कृतिक गुणों जैसे सौम्यता, सरलता, सज्जनता, सरलता, संयम तथा सन्तोष आदि का समावेश गृह-विज्ञान के गहन व वास्तविक अध्ययन और अभ्यास से होता है। नारी और गृह व्यवस्था उसके सांस्कृतिक विकास का प्रतीक है। शिक्षकाओं को इस उद्देश्य को दृष्टिगत रखकर विषय की शिक्षा देनी चाहिए ।
9. गृह की आय बढ़ाने हेतु व्यावसायिक क्षमता का विकास
बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति करने की दृष्टि से अधिकांश शिक्षित नारियाँ नौकरी करने की आवश्यकता अनुभव करती है। उनकी इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने में गृह विज्ञान शिक्षण सहायक होती है वे गृह-विज्ञान विषय की विभिन्न शाखाओं का गहन अध्ययन कर अपनी रूचि के अनुकूल व्यवसाय अपना सकती है।
गृह विज्ञान की छात्रा के समक्ष अनेक व्यवसायिक द्वार खुले हुए है जैसे घरों की सजावट का व्यवसाय, दर्जी का कार्य, प्रारम्भिक चिकित्सा निदेशिका, समाज सेविका, ग्राम सेविका पूर्व प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका, गृह-विज्ञान शिक्षिका शिशु-कल्याण निदेशिका, परिवार नियोजन निदेशिका आदि। इस प्रकार व्यवस्थाओं को अपनाकर घर की आय में वृद्धि कर सकती है।
10. अवकाश का सदुपयोग करने की क्षमता का विकास
अवकाश काल का सदुपयोग शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है शिक्षा प्रदान करने की बहुत कुछ सार्थकता इसी में है कि छात्रों को अवकाश काल का सदुपयोग करने का प्रशिक्षण दिया जाये। गृह-विज्ञान में छात्राओं को अनेक उपयोगी क्रियाकलापों का व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है। अवकाश के समय में रूचिकर कार्यों को कर सकती है तथा खाली समय में परिवार को प्रोत्साहित कर सकती है।
11. शारीरिक श्रम के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण का विकास
गृह विज्ञान शिक्षण में छात्राओं को प्रारम्भ से ही वे समस्त घरेलू कार्य जिनमें शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है करने का अभ्यास कराया जाता है तथा इन कार्यों को करने के महत्व से उन्हें अवगत कराया जाता है। कार्य करने की विविध आधुनिक विधियाँ बताई जाती हैं। परिणामतः वे समस्त घरेलू कार्यों को रूचि के साथ करती है।
12. गृह तथा समाज के मध्य समायोजन स्थापित करने की क्षमता का विकास
गृह सामाजिक जीवन की एक महत्वपूर्ण इकाई है। गृह के सामूहिक प्रयत्नों से ही समाज का निर्माण होता है। समाज परिवर्तनशील है। समय तथा परिस्थितियों के अनुसार उसके आदर्शों, मूल्यों, भावनाओं तथा विश्वासों में परिवर्तन होते रहते है। यदि इन सामाजिक परिवर्तनों के अनुकूल गृह के जीवन स्तर में परिवर्तन होता रहेगा तो ऐसा गृह विकासशील व समाजोपयोगी होगा। उसके सदस्य सुख एवं शान्तिमय तथा सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे। गृह-विज्ञान का अध्ययन करके छात्रा सामाजिक भावनाओ एवं स्तरों से परिचित हो जाती है। उसका दृष्टिकोण वैज्ञानिक एवं उदार बन जाता है।
13. शारीरिक विकास
गृह विज्ञान शिक्षण के द्वारा स्वास्थ्य के नियमों से अवगत कराकर उनको अपने व अपने कुटम्बियों के स्वास्थ को बनाये रखने की क्षमता प्रदान करती हैं इसके अतिरिक्त गृह-विज्ञान शिक्षण छात्राओं के अपने शारीरिक विकास का एक साधन है। गृह-विज्ञान विषय के शिक्षण में शारीरिक क्रियाओं को करने में पर्याप्त अवसर मिलते हैं।
14. मानसिक विकास
मानसिक विकास की दृष्टि से गृह-विज्ञान छात्राओं के ज्ञान भण्डार में वृद्धि करने का कार्य करता है। घर में गृहणी पर ही पारिवारिक सुख समृद्धि निर्भर करती है। उसे शरीर विज्ञान, प्राथमिक चिकित्सालय, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि सभी बातों का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए।
15. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास
इस विषय का वैज्ञानिक ज्ञान छात्राओं में घरेलू कार्यों को व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक ढंग से सम्पन्न करने की स्वस्थ आदतों का निर्माण करने में सहायता प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त उनमें पारिवारिक समस्याओं के सम्बन्ध में तर्कपूर्ण एवं प्रगतिशील विधि से सोचने की क्षमता उत्पन्न होती है। वैज्ञानिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए छात्राओं को यह विषय यथासम्भव वास्तविक परिस्थितियों में पढ़ाया जाना चाहिए ताकि उनकी विचारात्मक एवं क्रियात्मक शक्तियों की प्रेरणा मिले तथा अन्वेषण के प्रति उनकी रूचि बढ़े।
16. अनुशासन की भावना का विकास
गृह विज्ञान के विभिन्न विषय परोक्ष रूप से छात्राओं को अनुशासन की शिक्षा देते है। जब कक्षा में कई छात्राएँ किसी एक कार्य को एक साथ करती है तब उनको किसी क्रम या नियम का अनुसरण करना पड़ता है तथा एक-दूसरे का सहयोग देना पड़ता है। स्वबन्धित नियन्त्रण के द्वारा वे अनुशासन में रहती है अनुशासन अथवा व्यवस्था ही गृहकार्यों की सफलता का प्रथम सोपान है।
17. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विकास
गृह विज्ञान शिक्षण के द्वारा छात्राओं की प्रारम्भिक मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। गृह विज्ञान शिक्षिका छात्राओं की जन्मजात मूल प्रवृत्तियाँ, जैसे- जिज्ञासा, रचना, संचय, आत्म प्रदर्शन, विनयशीलता, युयुत्सा आदि को उपयोगी ढंग से मार्गन्तरित करके सन्तुष्ट करती है।
गृह विज्ञान के विभिन्न रूप वैज्ञानिक क्रियात्मक और कलात्मक आदि । गृह सम्बन्धी नई वस्तुओं अथवा विचारों की उत्पत्ति कर छात्राओं की क्रियात्मक शक्ति का उपयोग करती है और उन्हें आनन्द का अनुभव करती हैं।

