Adjustment: समायोजन की विधियाँ

समायोजन की विधियाँ ( Methods of Adjustment )


सामान्य व्यक्ति प्रत्येक प्रकार की प्रतिबल परिस्थिति में समायोजन करने का प्रयास करता है, कहीं वह अधिक सफल होता है कहीं कम। अधिकांश परिस्थितियों में उसका समायोजन साधारण होता है। प्रतिबल परिस्थिति कितनी भी तीव्र क्यों न ही वह उसमें समायोजन के लिए संघर्ष अवश्य करता है। समायोजन के प्रयास के निम्न दो प्रकार के हो सकते हैं-


1. प्रत्यक्ष प्रयास (प्रत्यक्ष नकल व्यवहार) (Direct Coping) 

इस प्रकार के प्रयास में समायोजन के वह तरीके आते हैं जो प्रत्यक्ष होते हैं और जिनमें व्यक्ति अशान्त करने वाली परिस्थिति को परिवर्तित करना चाहता है अथवा अशान्त करने वाली परिस्थिति को हटाना चाहता है या इस परिस्थिति से स्वयं को हटाना चाहता है।


इस प्रकार वह तीन प्रकार से समायोजन कर सकता है-

(1) आक्रमण (Aggression).

(2) सुलह (Compromise) तथा

(3) परिस्थिति से पीछे हटना (Withdrawal)


2. मनोरचनाएँ (Mental Mechanisms)

प्रतिबल अथवा अन्तर्द्वन्द्व और कुण्ठा से बचने के प्रयास में इन मनोरचनाओं का उपयोग व्यक्ति प्रतिदिन अपने दैनिक जीवन के व्यवहार में भी करता है। अन्तर्द्वन्द्व और कुण्ठा से सम्बन्धित तनाव को कम करने में इन मनोरचनाओं के उपयोग से व्यक्ति का सन्तुलन और समायोजन सामान्य हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ यह भय होता है कि उसके परिचित उसका तिरस्कार न करें, वह निःसहाय न हो जाय वा लोग उसे निकम्मा न कहें। इस प्रकार के भय विपत्ति की परिस्थितियों में अधिक बढ़ जाते हैं। इन भय उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों में भी व्यक्ति सरलता से नहीं झुकता है। इन परिस्थितियों में भी वह मनोरचनाओं का उपयोग करता है।


ब्राउन (J.F. Brown, 1940) के अनुसार मनोरचनाएँ वह चेतन और अचेतन प्रक्रियाएँ हैं जिनमें आन्तरिक संघर्ष कम होता है अथवा समाप्त हो जाता है। (The mechanisms are various conscious or unconsious processes where by the conflict situation is eliminated or reduced in its sverity)। 


इन मनोरचनाओं का वर्णन करते हुए ब्राउन ने आगे लिखा है कि Id, Ego तथा Superego के बीच उत्पन्न चेत्न या अचेतन संघर्ष या अन्तर्द्वन्द्व भी समाप्त हो जाता है। यह अन्तर्द्वन्द्व बड़े ही इकनोमिकल ढंग से तथा विभिन्न प्रकार से हो सकता है। इन मनोरचनाओं को कोलमैन (Coleman, 1947) ने Ego defence mechanism (Reaction) कहकर परिभाषित किया है कि वह व्यक्तियों की प्रक्रिया के प्रकार हैं जिनसे व्यक्ति में उपयुक्तता की भावना बनी रहती है तथा इनकी सहायता से व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से परेशानी (Stress) वाली परिस्थितियों से सामना करता है, बहुधा ये प्रतिक्रियाएँ चेतन तथा वास्तविकता को विकृति करने वाली होती हैं (Type of Reaction designed to maintain the individual's feelings of adequancy and worth rather than to cope directly with the stress situation usually unconscious and reality distorting)


मनोरचनाओं के प्रकार-


ब्राउन (1940) ने मनोरचनाओं के दो प्रकारों का उल्लेख किया है- 


(1) प्रधान मनोरचनाएँ (Major Mental Mechanisms)-

वे मनोरचनाएँ हैं जो अन्तर्द्वन्द्व परिस्थिति का स्वयं समाधान करती हैं। यह समाधान बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से होता है। इन मनोरचनाओं के कुछ उदाहरण -Sublimation, Repression, Regression. Rationalization आदि। 


(2) गौण मनोरचनाएँ (Minor Mental Mechanisms)-

ये वे मनोरचनाएँ हैं जिनका उपयोग प्रधान मनोरचनाओं द्वारा एक उपकरण (Tool) के रूप में होता है। इन मनोरचनाओं में कुछ उदाहरण हैं- (Projection, Displacement, Introjection, Identification, Compensation आदि। इनका संक्षिप्त वर्णन नीचे दिया हुआ है।


1. उदात्तीकरण (Sublimation)

फिशर (V.E. Fisher, 1952) ने इसको इस प्रकार समझाया है कि कामशक्ति की प्रवृत्तियों या प्रेरकों का नैतिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक विषयों की ओर पुनः निर्देशन की क्रिया ही उदत्तीकरण है। इसके द्वारा व्यक्ति अपनी अनैतिक प्रेरणाओं की सन्तुष्टि समाज स्वीकृत उ‌द्देश्यों के अनुसार करता है। कोलमैन (1947) के अनुसार इसके द्वारा कुण्ठित लैंगिक शक्ति (Frustrated sexual energy), शक्ति का वह साधन है जिससे यह शक्ति आंशिक रूप से Substitutive क्रियाओं में परिवर्तित हो जाती है। यह एक प्रकार का Redirection है। इस मनोरचना से सम्बन्धित व्यवहार समाज की दृष्टि से मान्य ही नहीं होता है बल्कि इस प्रकार के व्यवहार का समाज में एक निश्चित मूल्य भी होता है। उदाहरण के लिए, प्रेम की बाजी हार कर जाने कितने लोग साहित्य-सेवा में जुट जाते हैं और बड़े महान् साहित्यकार, कवि या संगीतकार बन जाते हैं। श्री गोस्वामी तुलसीदास, बैजू बावरा आदि इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।


2. दमन (Repression)

कोलमैन (1974) के अनुसार, वह मनोरचना है जिसके द्वारा घातक इच्छायें, असहनीय स्मृतियाँ आदि चेतना से अलग कर दी जाती हैं By which dangerous desires and intolerable memories are keptour of asciousness)। इस मनोरचना का उपयोग सर्वप्रथम फ्रायड ने किया। फ्रायड के अनुसार दुखद, अप्रिय और कष्टकारी इच्छायें और स्मृतियाँ चेतना क्षेत्र से स्वतः अथवा बिना. प्रयास के ही बहिष्कृत हो जाती हैं। फ्रायड का विचार है कि यह दमित सामग्री ही व्यक्ति को स्थायी विस्मृति हो जाती है।


यह सामग्री अचेतन मन में पहुँच जाती है। ब्राउन ने दमन का एक उदाहरण दिया है। एक लड़की के पिता बीमार थे। परिवार में पिता और पुत्री दो ही सदस्य थे। लड़की नौकरी करके घर का खर्च चलाती तथा पिता का इलाज करती थी। इलाज के लिए एक डाक्टर आता था। एक दिन पिता की हालत खराब थी। बीमार पिता के पास डाक्टर और पुत्री दोनों उपस्थित थे। लड़की के मन में डाक्टर को देखकर काम-इच्छा उत्पन्न हुई परन्तु बीमार पिता उत्तरदायित्व के कारण उसकी वह इच्छा कुछ ही समय में उसके चेतन मन स्वतः ही हट गई। के में


3. शमन (Suppression)

यह वह मानसिक मनोरचना है जिसके द्वारा व्यक्ति अप्रिय, दुखद और कष्टकारी घटनाएँ, विचार और इच्छाएँ, प्रेरणाएँ आदि को चेतना से जान-बूझकर निकाल देने की प्रक्रिया इच्छाएँ, प्रेरणाएँ लिए सुबह-सुबह यदि दूध वाले से झड़प हो गई, बड़ा बुरा लगा। परन्तु यह सोचकर बात को दिमाग से निकाल दिया कि जो हुआ सो हुआ और ऐसा विचार कर किसी अन्य कार्य में जुट गए।


4. प्रतिगमन (Regression)

कोलमैन (1947) के अनुसार Ego एकता को बनाए रखने के लिए तथा परेशानी (Stress) को दूर करने के लिए जब व्यक्ति परिपक्व (Less mature) प्रत्युत्तरों का सहारा लेता है तो यह प्रतिगमन है। इसे Flight to childhood भी कह सकते हैं। इस मनोरचना में व्यक्ति अपने से कम अवस्था के व्यक्तियों के व्यवहार को अपनाता है। प्रतिगमन बाल्यावस्था तक हो सकता है। इस मनोरचना के उदाहरण हैं-एक विवाहित लड़के का अपनी माँ की छाती पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोना, क्रोध में तोड़-फोड़ करना या बच्चों की तरह चीख-चीखकर रोना, चिल्लाना आदि।


5. औचित्य स्थापना (Rationalization)

कोलमैन (1947) के अनुसार इस मनोरचना में व्यक्ति जो कर चुका है या कर रहा है या करने वाला है उस कृत्य के सम्बन्ध में अच्छे तर्क देकर उसे उपयुक्त ठहरने का प्रयास करता है (In this the individual thinks up 'good' reasons to justify what he has done, is doing, or intends to do)। इसमें व्यक्ति अपने को उचित ठहराने के लिए झूठे कारण और प्रक्रियाएँ भी देता है। उदाहरण के लिए, अंगूर खट्टे हैं, नाच न आवे आँगन टेढ़ा तथा यदि परीक्षा में फेल होने के बाद एक विद्यार्थी इस प्रकार कहे कि मैं रट-रटकर पास नहीं होना चाहता हूँ, किताबी कीड़ा बनना नहीं चाहता हूँ आदि।


6. प्रक्षेपण (Projection)

पेज़ (J.D. Page, 1962) के अनुसार अपनी भावनाओं और लक्षणों को दूसरों में देखना या दूसरों पर आरोपित करना ही प्रक्षेपण है। कोलमैन (1947) के अनुसार यह वह मनोरचना है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी कठिनाइयों का दोषारोपण दूसरों पर करता है। इस मनोरचना के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि Projection is a defensive reaction by means of which transfers the blame for our shortcomings, mistakes and misdeads to others. Secondly it attributes to others our own impulses, thoughts, and desires.


इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

(1) टेनिस के खेल में हारने वाला एक खिलाड़ी कहे कि गेंद अच्छी नहीं थी,

(2) फेल होने वाला विद्यार्थी कहे कि परीक्षण खराब था,

(3) भ्रष्टाचारी व्यक्ति अक्सर कहते सुने जाते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, आदर्शों, धार्मिक मर्यादाओं और नैतिक मर्यादाओं का निरादर हो रहा है आदि।


7. अन्तःक्षेपण (Introjection)

इसे संक्षेप में 'Flight to itself' कह सकते हैं। इसमें और प्रक्षेपण के अन्तर को स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि Introjection is like identification except that in identification the individual wants to like the object, while in introjection he consides the object a part of himself. दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि वातावरण के गुणों को जब व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में सम्मिलित कर लेता है तब व्यक्ति की वह प्रवृत्ति अन्तक्षेपण कही जाती है। इसके उदाहरण हैं- किसी के दुख में दुखी होकर स्वयं उसके जैसा अनुभव करना, यह कहना You are always with me या यह कहना I shall carry you for ever in my heart आदि ।


8. आत्मीकरण (Identification)

ब्राउन (1940) के अनुसार इसमें व्यक्ति अपनी Ego या व्यक्तित्व को दूसरों के व्यक्तित्व-साँचे में ढालने का प्रयत्न करता है या दूसरों के व्यक्तित्व को अपना समझने लगता है। इस मनोरचना में व्यक्ति अपने व्यवहार, अपनी क्रियाओं अथवा अपने आपको किसी अन्य व्यक्ति के अनुसार बनाने का प्रयास करता है या बना लेता है। कोलमैन (1974) के शब्दों में In this the individual identifies himself with some person or institution, usually of an illustratious nature. जब हम किसी व्यक्ति की वेशभूषा की नकल करते हैं या उसके बोलने के ढंग या हेयर स्टाइल आदि की नकल करके उसके समान अपने आपको समझने लगते हैं तो यह आत्मीकरण है। बहुधा किशोर-किशोरियाँ अभिनेताओं से अपने आपको आइडेन्टीफाई करते हैं। अपने माता-पिता या प्रोफेसर से भी आत्मीकरण दैनिक जीवन में देखे जा सकते हैं।


9. विस्थापन (Displacement)

पेज (1962) के अनुसार यह मनोरचना है जिसमें किसी विचार या वस्तु से सम्बन्धित संवेग किसी वस्तु या विचार पर स्थानान्तरित हो जाता है। एक बन्ध्या स्त्री दूसरे बच्चे प्रेम करे या कोई अपनी स्त्री से क्रोधित हो परन्तु क्रोध उस पर व्यक्त न कर पाए और क्रोध अपने कुत्ते पर व्यक्त करे तो यह विस्थापन का उदाहरण है।


10. क्षतिपूर्ति (Compensation)

कोलमैन (1974) के अनुसार इस मनोरचना के द्वारा अवांछनीय लक्षण को व्यक्ति वांछनीय लक्षण के बढ़े हुए रूप के द्वारा बदल लेता है। इन मनोरचना के द्वारा व्यक्ति अपनी हीनता और अनुपयुक्तता के लक्षणों से अपनी सुरक्षा करता है। इस मनोरचना को समझाते हुए कोलमैन ने कहा है कि Compansatory reactions are defenses against feelings of inferiority and inadequacy growing out of real or imagined personal defects or weaknesses as well as not or our invitable failures and setbacks. उदाहरण के लिए एक कम सुन्दर लड़की या लड़का अपने व्यवहार को मधुर बना लेते हैं।


#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top