Art of Motherhood: मातृत्व कला से आप क्या समझते हैं?

मातृत्व कला से आप क्या समझते हैं? शिशु की देखभाल हेतु कौन से ज्ञान और कौशल की आवश्यकता होती है?


मातृ कला (Art of Motherhood) वस्तुतः शिशु पालन एवं रक्षा संबंधी ज्ञान एवं दक्षताओं का विज्ञान है। माँ शब्द बालक के साथ ही सम्पूर्णता प्राप्त करने वाला शब्द है। वह स्त्री जो बालक को धारण करती है तथा पालन करती है, माँ कहलाती है। चूँकि शिशु को धारण एवं पालन करना दोनों ही कठिन समस्याओं के समान कार्य हैं। अतः एक माँ के कुछ नैसर्गिक गुण जैसे-ममता, दया, सहनशीलता, श्रम, त्याग, स्वतः ही आ जाते हैं। इन ही गुणों को मातृत्व के गुण कहलाते हैं।


मातृत्व अर्थात् मातृ-तत्व-माता योग्य तत्व हमारे शास्त्रों में माता के स्थान को गुरु एवं पिता दोनों से उच्च बताया गया है।


यही मातृत्व जब बालक के लालन-पालन के वैज्ञानिक एवं कलात्मक ज्ञान से परिपूरित हो जाता है तो सर्वगुण सम्पन्न बालक का सृजन कर सकता है। बालकों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ सकता है।


चैम्बर्स डिक्शनरी में मातृकला का अर्थ

"शिशु पालन के लिये आवश्यक ज्ञान एवं दक्षता दिया गया है शिशु पालन से तात्पर्य है- बालक को छोटे से बड़ा करना, निर्भर से आत्म निर्भर बनाना, असहाय से स्वावलम्बी बनाना।


मातृकला एवं शिशु पालन का महत्व मातृकला माँ के लिये निर्देशिका का कार्य करती है तथ बालक के बेहतर वृद्धि एवं विकास में सहायता करती है। आजकल मातृकला की शिक्षा बालिकाओं का औपचारिक शिक्षा के अन्तर्गत 10वीं तथा 12वीं कक्षाओं में दी जाती है।


मातृकला वस्तुतः विकासशील एवं अविकसित देशों में और भी अधिक आवश्यक हो जाती है। मातृकला एवं शिशु रक्षा के अध्ययन में हमें निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते है।


1. मातृत्व प्राप्ति में सहायक।

2. गर्भावस्था के महत्व का ज्ञान।

3. गर्भावस्था की आवश्यकताओं एवं उनकी पूर्तियों का ज्ञान।

4. गर्भावस्था में शिशु के उचित विकास में सहायक।

5. प्रसव कालीन जानकारी प्रदान करना।

6. शिशु पालन की दिग्दर्शिका के रूप में सहायक।

7. स्वस्थ आदतों के निर्माण में सहायक।

8. मातृ एवं शिशु मूल्य को कम करने में सहायक ।

9. जन्मदर कम करने में सहायक।

10. सामाजिक अन्ध विश्वार्सों एवं बुराइयों के अन्त में सहायक।


मातृत्व के लिये अनिवार्य योग्यताओं को निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-


1. जैविकीय योग्यता-


(ए) धार्मिक योग्यता  (बी) संतानानुक्रम योग्यता  (स) वंशानुक्रम योग्यता


2. मनोवैज्ञानिक योग्यता

3. आर्थिक योग्यता


अच्छे मातृत्व की विशेषताएँ (Characteristics of good motherhood)


अच्छे मातृत्व की निम्नलिखित विशेषताएँ बतलाई जा सकती है-


1. अच्छा मातृत्व शिशु पालन की एक कला है-

अच्छे मातृत्व के द्वारा गर्भाधान शिशु के जन्म एवं विकास तथा उसकी देखभाल आदि के सम्बन्ध में जो ज्ञान व विचार पहले से ही ज्ञात है उसे व्यवहारिक समय में लागू किया जाता है और इस प्रकार अच्छे मातृत्व के द्वारा ही माता बच्चे के पालन पोषण के सही तरीके को अपनाकर उसके सर्वागीण विकास में सहायता करती है।


2. अच्छा मातृत्व एक बाल केन्द्रित कला है-

वैसे तो मातृकला एवं शिशु कला शिक्षा के समान एक द्विमुखी प्रक्रिया है। मातृत्व कला का केंद्र बालक ही होता है और उसी को देखभाल व कल्याण हेतु शिशु पालन का विकास हुआ।


3. मातृत्व कला शिशु पालन की देखभाल व पालन पोषण में विकासात्मक दृष्टिकोण अपनात है-

बालक कोई स्थायी प्राणी नहीं होता बल्कि वह पौधे के समान विकसित होता हुआ प्राणी होता है। वह गर्भावस्था से नवजात शिशु की अवस्था, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था आदि को पार करता हुआ युवावस्था एवं परिपक्वावस्था आदि को पार करता है। अच्छे मातृत्व के द्वारा ही बालक का विकासात्मक प्रकृति अच्छे से हो जाती है।


4. मातृत्व कला, विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित है-

मातृत्व कला बालक के सर्वांगीण विकास के लिए विकास के विभिन्न क्षेत्रों तथा शारीरीि, क्रियात्मक, संवेगात्मक, सामाजिक, चारित्रिक आदि से सम्बन्धित है। इस सम्बन्ध में उनकी मान्यता है कि यदि विकास के किसी भी क्षेत्र में कमी रह जाएगी तो अन्य क्षेत्र का विकास निरर्थक सिद्ध होगा।


5. मातृत्व कला, शिशु पालन के गर्भावस्था से पूर्व किशोरावस्था तक अध्ययन करता है-

बालक के गर्भावस्था से ही शिशु के पालन के प्रति माता को जागरूक एवं निर्देशित करने का कार्य मातृत्व कला करता है। यह देखभाल तब तक होती रहती है जब तक कि बालक का आधारभूत विकास न हो जाए।


6. मातृत्व कला गर्भावस्था में तथा गर्भावस्था के बाद मां की देखभाल से भी सम्बन्चित है-

अच्छा मातृत्व बालक को देखभाल के साथ-साथ मां की भी देखभाल करती है। क्योंकि बालक का उचित देखभाल तभी हो सकता है जब कि गर्भावस्था और गर्भावस्था के बाद मां (प्रसूता) शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। अच्छे मातृत्व की यही विशेषता होती है कि वह दोनों ही स्थितियों में माता की देखभाल करती है।


7. मातृत्व कला जीवशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त पर आधारित-

बालक का जन्म व विकास विशेष तौर पर जीव शास्त्र, समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान के ज्ञान के आधार पर हुआ। इन तीनों शास्त्रों ने बालक के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं के समुचित विकास के लिए मार्ग प्रशिस्त किया। इसलिए अच्छा मातृत्व तभी होता है जब इन तीनों शास्त्रों का ज्ञान हो।


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